Ayush Sharma
Ayush Sharma

@ayusharma_bh

6 تغريدة 2 قراءة Jul 09, 2024
राजा का पद देखने में मनोरम् लगता है किन्तु सात्विक महानुभाव के लिए उसका निर्वहन कठिन है। महाभारत में क्षात्रधर्म को निष्ठुर कहा गया है। क्षात्रधर्म का अनुपालन करने पर अपने पुत्रों, पिता या समस्त कुल की भी मृत्यु देखनी पड़ती है और तब भी विचलित नहीं होते हैं।
राज्य पर आक्रमण होने पर परिवार सहित छिपना पड़ता है, रणभूमि में मर जाना होता है, राज्य संचालन हेतु काम-क्रोध का सेवन करना पड़ता है, रानियों को अग्निकुण्ड में कूद जाना पड़ता है।
राजपद भोग के लिए नहीं होता है। जो राजा पद का कार्यकर्ता न होकर उपभोक्ता बनता है, उसका पतन हो जाता है।
ब्राह्मणों का कार्य मार्गदर्शन करना है और क्षत्रियों का कार्य नेतृत्व करना है, यह आर्षविधा है। क्षत्रियों का धर्म प्रजा की रक्षा करना है, इसका फ़ल प्रजा पर शासन है।
यद्यपि आपदकाल में ब्राह्मण भी क्षात्रधर्म को धारण कर सकते हैं। यह कल्याण में बाधक नहीं अपितु धर्म है।
चार प्रकार के यज्ञों का वर्णन आता है-
जपयज्ञ - ब्राह्मण (गायत्री और भजन)
आलम्भयज्ञ - क्षत्रिय (दान और हिंसा)
हविष्ययज्ञ - वैश्य (पदार्थहोम)
सेवायज्ञ - शूद्र (परिश्रम)
प्रजा की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देना क्षत्रियों का महायज्ञ है। इससे क्षत्रिय उसी गति को प्राप्त करते हैं
जिसे योगी वर्षों तक तपस्या करके पाते हैं।
श्रीमन्नारायण व सदाशिव सभी को अपने कार्यों में लगाकर स्वयं निवृत्त रहते हैं तो क्या उनका शासन नहीं होता है? प्रवृत्ति प्रवृत्ति के लिए नहीं, निवृत्ति हेतु है। राजाओं के गुरु ब्राह्मण होते ही थे। न्यायाधीश ब्राह्मण होते थे।
क्षत्रिय भी अपनी राजसीप्रवृति को धर्मोचित राज्यसंचय व प्रजापालन में लगाकर वानप्रस्थ ले सकते हैं।
आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त को राजा बनाया और स्वयं महामंत्री (प्रधानमंत्री) बने। जिस कुटिया में आचार्य निवास करते थे, उसकी छत्त टपकती है, ऐसा तपोमय जीवन आचार्यों का होता था।

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