आज पति द्वारा पत्नी को प्रणिपात (चरणस्पर्श) किया जा रहा है जोकि अधर्म है। इससे पत्नी को नरक और पति को अधोगति की प्राप्ति होगी।
भगवान श्रीकृष्ण राधाजी के चरण पकड़ते थे, इस प्रसंग को आधारभूत कहते हैं। निकुंजवन में विशुद्ध प्रेम की लीला को रास कहा जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण राधाजी के चरण पकड़ते थे, इस प्रसंग को आधारभूत कहते हैं। निकुंजवन में विशुद्ध प्रेम की लीला को रास कहा जाता है।
उस रास में कभी श्रीकृष्ण भगवान राधाजी के ऊपर चलते हैं, अधरामृत का पान करते हैं। कभी राधाजी श्रीकृष्ण भगवान के ऊपर चलती हैं, चरणामृत का पान करती हैं। कभी श्रीकृष्ण भगवान राधाजी को उठा लेते हैं, कभी राधाजी श्रीकृष्ण भगवान के कंधे पर चढ़ जाती हैं।
वन में भागते हुए राधाजी दिखती हैं किन्तु कुछ क्षणों पश्चात वही श्रीकृष्ण दिखाई पड़ते हैं। श्रीकृष्ण दिखाई पड़ते हैं फिर दो पल में वही राधाजी जान पड़ती हैं।
कृष्ण राधा बन जाते हैं और राधा कृष्ण बन जाती हैं। दोनों एक हो जाते हैं।
कृष्ण राधा बन जाते हैं और राधा कृष्ण बन जाती हैं। दोनों एक हो जाते हैं।
हम जीवों के हृदय को प्रफुल्लित करने की भावना से उस एकतत्व ने स्वयं को दो रूपों में प्रकट करके प्रेमलीला का मंचन किया है।
इसी लीला में परम् पुरुष अपनी ह्लादिनी शक्ति के चरण थाम लेते हैं। अगले ही क्षण राधाजी श्रीकृष्ण के चरण थाम लेती हैं।
इसी लीला में परम् पुरुष अपनी ह्लादिनी शक्ति के चरण थाम लेते हैं। अगले ही क्षण राधाजी श्रीकृष्ण के चरण थाम लेती हैं।
यहाँ आशीर्वाद लेने या कृपा पाने के लिए प्रणाम नहीं किया जा रहा है अपितु दोनों अपने भेद को निरस्त करके एक होने का दिव्य मंचन कर रहे हैं।
एक सामान्य स्त्री-पुरुष (पति-पत्नी) भी जब एकांत में अंशमात्र प्रेम से विगलित होते हैं तब कौन किसके किस स्थान को पकड़ता है, भान नहीं रहता है।
एक सामान्य स्त्री-पुरुष (पति-पत्नी) भी जब एकांत में अंशमात्र प्रेम से विगलित होते हैं तब कौन किसके किस स्थान को पकड़ता है, भान नहीं रहता है।
फिर वह तो सच्चिदानन्दघनविग्रह भगवान हैं जो अखण्डप्रेम और प्रेमास्पद हैं, जिनका देह दिव्य चिन्मय होता है। अतएव सच्चिदानन्द विग्रह परम रस रसराज श्रीकृष्ण में और सच्चिदानन्दविग्रहा आनन्दांशघनीभूता, आनन्द-चिन्मय-रस-प्रतिभाविता रसमयी श्रीराधा में तत्त्वतः कुछ भी अन्तर नहीं है।
पुरुष भर्ता है, स्वामी है। स्त्री वनिता है, कामिनी है। स्त्री द्वारा पुरुष प्रणम्य है। पुरुष द्वारा स्त्री रक्षणीय है। पुरुष द्वारा स्त्री को आशीष प्रदान किया जाना विहित है। यह धर्म है।
जय श्रीकृष्ण।
जय श्रीकृष्ण।
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