बौधायनधर्मसूत्र में वचन है- अध्यापन, यज्ञ और दान लेने में असमर्थ होने पर ब्राह्मण क्षत्रिय के धर्म का आश्रय लेकर जीविका निर्वाह करे क्योंकि यही ब्राह्मणधर्म के निकट है किन्तु गौतम का मत है कि ब्राह्मण ऐसा न करे क्योंकि क्षत्रिय के धर्म ब्राह्मण के लिए अत्यन्त कठोर होते हैं।
अपराधी को दण्ड देकर अवक्रोश पचाने की शक्ति क्षत्रिय में होती है। ब्याज का धन पचाने की शक्ति वैश्य में होती है। अपार श्रम-बंधन झेलने की क्षमता शूद्र में होती है।
ब्राह्मणों के द्वारा इन जीविका का आलम्बन लेने पर रोग, व्याधि, दरिद्रता आदि विपत्तियों का प्रकोप ग्रास कर लेता है।
ब्राह्मणों के द्वारा इन जीविका का आलम्बन लेने पर रोग, व्याधि, दरिद्रता आदि विपत्तियों का प्रकोप ग्रास कर लेता है।
वर्तमान नहीं तो आने वाली पीढ़ियों में प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार ब्राह्मणों के कर्म अग्नि के समान होते हैं। ब्राह्मण भी यदि उन कर्मों का आलम्बन लेते हुए अपेक्षित आचार-विचार से च्युत हो जाए तब विपरीत परिणाम प्राप्त होते हैं। ऐसे में अन्यों की दशा विकट होना स्वाभाविक है।
वेदाध्यापन (आचार्य), कर्मकाण्ड-यज्ञादि (पुरोहित), भविष्य बतलाना (ज्योतिष), ब्रह्मभोज (देव-पितृो को तृप्त करना) आदि में शरीर की पात्रता का ऊँचा महत्व होता है।
हमनें आचार्यों से सुना है यजमान के पाप भी पुरोहित को आ लगते हैं। इतना ताप सहने की क्षमता होनी चाहिए।
हमनें आचार्यों से सुना है यजमान के पाप भी पुरोहित को आ लगते हैं। इतना ताप सहने की क्षमता होनी चाहिए।
एक स्मृतिवचन है कि नित्य आठ गायत्री की माला करने वाला समस्त पृथ्वी के मनुष्यों के दान को भी पचा लेता है। इसलिए संध्याविहीन होकर ब्राह्मणवृत्ति अपनाना पातक सिद्ध होता है।
अब्राह्मण व स्त्री को भूलकर भी ब्राह्मणवृत्ति का जीविका हेतु आश्रय नहीं लेना चाहिए, आत्मघाती मार्ग है।
अब्राह्मण व स्त्री को भूलकर भी ब्राह्मणवृत्ति का जीविका हेतु आश्रय नहीं लेना चाहिए, आत्मघाती मार्ग है।
आज कोई भी ज्योतिषी बन जा रहा है, भविष्य बतलाना और तदनुकूल उसका उपाय करना प्राकृत नहीं माना जाता है, यदि ज्योतिषी में कर्मफ़ल के परिवर्धन को पचाने की क्षमता व गायत्री का बल न हो, ऐसी स्थिति में वे दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
साथ ही ब्राह्मणवृत्ति में उपदेशक की भूमिका निभाई जाती है, अन्यों के उपदेश करने पर भी पतन ही होगा।
आज कोई भी व्यक्ति और स्त्रियों द्वारा एस्ट्रोलॉजी के नाम पर भविष्यवक्ता बना जा रहा है जबकि शास्त्रों ने ब्राह्मण के लिए भी ज्योतिष से जीविकार्जन अच्छा नहीं माना है।
आज कोई भी व्यक्ति और स्त्रियों द्वारा एस्ट्रोलॉजी के नाम पर भविष्यवक्ता बना जा रहा है जबकि शास्त्रों ने ब्राह्मण के लिए भी ज्योतिष से जीविकार्जन अच्छा नहीं माना है।
व्यवहारिक धरातल पर अन्य भी समस्याएँ हैं, शासन द्वारा अब्राह्मण व अंत्यजों को पुजारी बनाया जा रहा है। इससे अन्यों द्वारा वे पूजित होंगे व चरणस्पर्श किया जाएगा, ऐसा करने पर भक्तवृंद की दुर्गति से पहले वे पुजारी भयंकर नरक में जाएँगे।
सार यह है कि अग्नि को स्पर्श करने या उसके साथ खेलने का परिणाम कुछ अच्छा नहीं होता है। अपने ऊपर कृपा करके अधिकार की सीमा में कर्मों का आलम्बन लें, पतिव्रता स्त्री बिना ज्योतिषादि का ज्ञान प्राप्त किए अपने सतीत्व के बल पर यथोचित कार्य साध लेती थीं।
इसी प्रकार हर व्यक्ति की रक्षा उसका धर्म करता है, स्वधर्म से ही सिद्धि की प्राप्ति भी होती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।
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