स्त्रियों की स्वतंत्रता, विद्रोह आदि पर चर्चा होती है। दूसरी ओर पुरुषों में व्यसन व्याप्त हो रहा है।
जड़ समस्या पर विचार करने की आवश्यकता है। धर्म के अनुपालन में प्रमाद ही कालांतर में अधर्म का रूप लेता है।
जड़ समस्या पर विचार करने की आवश्यकता है। धर्म के अनुपालन में प्रमाद ही कालांतर में अधर्म का रूप लेता है।
आर्यों के देश भारत में कम-से-कम ३०% स्त्रियों ने किसी-न-किसी प्रकार की घरेलू हिंसा झेली है। क्या हमें मातृशक्ति को प्रताड़ित जानकर लज्जा का अनुभव नहीं होता है?
यदि कर्मनिवृत्त पूर्वपीढ़ी ने समस्या को समस्या माना होता और निवारण का प्रयास किया होता तो आज यह स्थिति न उत्पन्न होती।
यदि कर्मनिवृत्त पूर्वपीढ़ी ने समस्या को समस्या माना होता और निवारण का प्रयास किया होता तो आज यह स्थिति न उत्पन्न होती।
अपने अधिकार का सीमा से कम उपयोग किया जाए तो अधीनजन निरंकुश होकर उन्माद को जन्म देते हैं और यदि सीमा से अधिक उपयोग किया जाए तो किसी को अधिक दबाने का परिणाम महाप्रतिकार के रूप में सामने आता है।
वर्तमान में भयाभय आँकड़े सामने आ रहे हैं। घरेलू हिंसा में पीड़ित पुरुषों की संख्या स्त्रियों के समान हो गई है। विभिन्न सामाजिक रीतियों का विखंडन इसी का परिणाम है।
क्रोधी व्यक्ति का कोई नहीं होता है। हमनें ऐसे सज्जन भी देखें हैं जो अपने पिता के मरने की प्रतीक्षा करते हैं।
क्रोधी व्यक्ति का कोई नहीं होता है। हमनें ऐसे सज्जन भी देखें हैं जो अपने पिता के मरने की प्रतीक्षा करते हैं।
बच्चों से लेकर पत्नी को मानवता का अतिक्रमण करके दण्डित करना सर्वदा अनुचित है। ऐसे भी मोहल्ले जानते हैं जिनमें लगभग सभी स्त्रियाँ और बच्चे पुरुषों द्वारा ताड़ित किए जाते हैं।
उन पत्नियों में प्रतिकार का सामर्थ नहीं था किंतु उन्होंने ऐसे बालक उत्पन्न किए जो द्रोहभाव के साथ जन्मे।
उन पत्नियों में प्रतिकार का सामर्थ नहीं था किंतु उन्होंने ऐसे बालक उत्पन्न किए जो द्रोहभाव के साथ जन्मे।
आज वही संताने पूरे समाज का नेतृत्व कर रही हैं।
आज महानगरों में दुर्गम स्थिति है। वहां स्त्रियाँ पुरुषों को अपने तलवों के नीचे रखती हैं और अपनी इच्छानुसार उपयोगी सामग्री मानती हैं। अधिक आप जानते हैं।
इन सबके लिए प्रत्यक्ष रूप से न स्त्री दोषी हैं और न पुरुष।
आज महानगरों में दुर्गम स्थिति है। वहां स्त्रियाँ पुरुषों को अपने तलवों के नीचे रखती हैं और अपनी इच्छानुसार उपयोगी सामग्री मानती हैं। अधिक आप जानते हैं।
इन सबके लिए प्रत्यक्ष रूप से न स्त्री दोषी हैं और न पुरुष।
स्वतंत्रता उपरांत पुरुषों की मनोदशा घोरविकृत अवस्था में पहुँच चुकी थी। स्त्रियों को आभुषित रखकर दशकों की गुलामी का मुख्य बोझ पुरुषों ने झेला था। स्वतंत्रता उपरांत सब ठीक नहीं हुआ बल्कि एक-एक रोटी के लिए झपटना आरंभ हो गया। हर राज्य अस्थिर था, समाज अस्थिर था, व्यक्ति हताश-निराश थे।
नए राज्य क्यों बने? जीविका और लोकहित की भावना से। हित हुआ? नहीं, आज तक पीढ़ित हैं।
हमनें पहले भी एक बार समझाया था कि यदि वासनाओं का दमन न करके दबा दिया जाए तो एक-दो पीढ़ियों के भीतर वे प्रकट हो जाती हैं अथवा बीज रूप में शेष इच्छाएँ कर्मरूपी वृक्ष का रूप लेती हैं।
हमनें पहले भी एक बार समझाया था कि यदि वासनाओं का दमन न करके दबा दिया जाए तो एक-दो पीढ़ियों के भीतर वे प्रकट हो जाती हैं अथवा बीज रूप में शेष इच्छाएँ कर्मरूपी वृक्ष का रूप लेती हैं।
जो कार्य जीव स्वयं नहीं कर सकता वह अपने पुत्र-पौत्र, पुत्री आदि के माध्यम से करता है।
समाधान क्या है?
स्वयं को मातृशक्ति मान धार्मिक स्त्रियों को उदारता का परिचय देते हुए माता की भांति पुरुषों के प्रति करुणा रखते हुए अभयदान देना चाहिए।
समाधान क्या है?
स्वयं को मातृशक्ति मान धार्मिक स्त्रियों को उदारता का परिचय देते हुए माता की भांति पुरुषों के प्रति करुणा रखते हुए अभयदान देना चाहिए।
दूसरी ओर पुरुषों को इंद्रियनिग्रह के अभ्यास में निरत रहते हुए मातृशक्ति के जन्मसिद्ध स्वभाव को जान सहानुभूति रखनी चाहिए। अपनी माता, पत्नी, पुत्री आदि के प्रति अपने दायित्व का यथासमय निर्वाहन करने का प्रयत्न करना चाहिए।
यदि 'आँख के बदले आँख' की नीति अपनाएँ तो कुछ ही समय में पूरा विश्व अंधा होगा। इसलिए किसी एक को विवेक का परिचय देते हुए अपने कोप को समेटना चाहिए।
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