हितैषी और हितज्ञ में बहुत अंतर है। कफ से पीड़ित बालक के रोने पर उसको दूध पिलाने वाली माँ अपने बच्चे की हितैषी है किन्तु हितज्ञ नहीं।
राष्ट्र और धर्म की चिंता करने वाले तथाकथित नेता और बुद्धिजीवी राष्ट्र के हितैषी हो सकते हैं किन्तु हितज्ञ नहीं।
राष्ट्र और धर्म की चिंता करने वाले तथाकथित नेता और बुद्धिजीवी राष्ट्र के हितैषी हो सकते हैं किन्तु हितज्ञ नहीं।
हितज्ञ होने के लिए धर्म को यथार्थ रूप में जानना और मानना होगा, जो कि सबके सामर्थ्य की बात नहीं।
शेरनी का दूध सिर्फ स्वर्ण पात्र में ही बच सकता है, अन्य किसी धातु में उसको झेलने का सामर्थ्य नहीं है।
शेरनी का दूध सिर्फ स्वर्ण पात्र में ही बच सकता है, अन्य किसी धातु में उसको झेलने का सामर्थ्य नहीं है।
हितैषी-जो हमारा हित चाहता हो (भले उसे हित की समझ हो या न हो) हितज्ञ-जो हित चाहता हो साथ ही हमारा हित अहित समझता भी हो और समझ कर हित करने मे समर्थ भी हो।
— पुरीपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाभाग
— पुरीपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाभाग
हितैषी, हितज्ञ, हित जानने वाला और हित करने में समर्थ केवल ऐसे व्यक्ति ही स्वस्थ सर्वहितप्रद मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
कोसने वाले हज़ार मिल जाएँगे किंतु मूल समस्या पर किसी का ध्यान नहीं है। किस विसंगति के फलस्वरूप यह घातक परिणाम दृष्टिगोचर है, इसपर किसी का ध्यान नहीं है।
कोसने वाले हज़ार मिल जाएँगे किंतु मूल समस्या पर किसी का ध्यान नहीं है। किस विसंगति के फलस्वरूप यह घातक परिणाम दृष्टिगोचर है, इसपर किसी का ध्यान नहीं है।
अपेक्षित माताएँ अपनी पुत्रियों के साथ कितना न्याय कर पाईं? स्वयं स्त्री होकर भी किसी कन्या का हित न समझ पाना और शिथिल रहना विसंगति में हेतु है। पूर्वकाल में पुरुष नहीं माताओं की ओर से ही अपनी पुत्री-पौत्री आदि के उचित संस्कारों के क्रियान्वयन के स्वर आते थे।
मुख्य कारण पुरुष है क्योंकि वह ही अपने दायित्वों को भूलकर विकास (के नाम पर विनाश) की दौड़ में भागे चले जा रहे हैं। सनातन हर प्रशस्त मानबिंदु को पिछड़ा, रूढ़िवादी और असभ्य दर्शा दिया गया है।
आज देहात्मवाद एवम नास्तिकवाद इतना प्रबल है कि चारों ओर व्यक्ति विपरीतबोध के शिकार हैं।
आज देहात्मवाद एवम नास्तिकवाद इतना प्रबल है कि चारों ओर व्यक्ति विपरीतबोध के शिकार हैं।
स्त्री पुरुषों की प्रज्ञाशक्ति का ह्रास हो चुका है जिससे अंतर्निहितसत्य जानने पर भी वह अपने विवेक का प्रयोग करने में असमर्थ हैं। सरल भाषा में कहें तो बहे चले जा रहे हैं बहे चले जा रहे हैं। कहाँ जाकर गिरेंगे किसको भान नहीं है।
देहात्मवादियों की गति केवल इंद्रियों तक होती है। वर्तमान में किए उनके कर्मों के क्या दूरगामी परिणाम होंगे यह होश नहीं है।
राज्य बनाने वाले कौन? प्रजा। यथा प्रजा तथा राजा।
राज्य बनाने वाले कौन? प्रजा। यथा प्रजा तथा राजा।
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