Ayush Sharma
Ayush Sharma

@ayusharma_bh

11 تغريدة 3 قراءة Jul 14, 2022
Tamping, Straining, Filtration, Stamping, Moulding, Condensing.
यह सभी कार्य इन सज्जन के द्वारा किए जाते हैं। आज अर्थ का स्रोत कुछ व्यक्तियों के पास चला गया है जो अपार धन एकत्रित करने में विश्वास रखते हैं जबकि वास्तविक श्रमिक का अपकर्ष हो रहा है।
आज इनके पास ज्ञान और कला है किंतु लोभ नहीं है, अपार धन एकत्रित करने का लालच नहीं है और छलपूर्वक बेचने तथा सूट-बूट पहनकर ठगने की कला नहीं है।
सनातन वैदिक आर्य हिंदूराष्ट्र में इन जैसे उद्योग परायण सज्जनों का उत्कर्ष होगा।
जब हमारा 'कुम्हार' वस्तु निर्माण करता है तो प्रकृति को विकृत नहीं करता किंतु जो केवल धनाढ्य बनने के लिए उद्योग लगाते हैं उनके लिए स्वार्थ सर्वोपरि होता है। कर्मचारियों को गुलाम मानते हैं और प्रकृति को ताक पर रखकर विकास करते हैं।
इसलिए परंपराप्राप्त व्यक्तियों को उनका अधिकार दिया जाए। परंपराप्राप्त जीविका का स्रोत अपनाने से व्यक्ति व समाज का उत्कर्ष ही होता है।
आज भारत में माली को हीन दृष्टि से देखा जाता है। जबकि विदेशों में माली का सम्मान होता है। माली के कार्य को Floristry कहा जाता है।
समूल flora का ज्ञान हमारे मालियों को हुआ करता था। कैसे? परंपरा से।
Herbs and shrubs का ज्ञान मालियों को होता था। सैकड़ों पौधों की medicinal properties, soil fertility impact आदि के बारे में वृहत जानकारी होती थी।
जब माली जाति के पास वह ज्ञान परंपरा से सुरक्षित था तब तक वह उन्नति को प्राप्त करते रहे।
इसी प्रकार लौहार जाति के व्यक्ति कला और ज्ञान से सबल होते थे। अपने पूर्वजों से पूछिए पहले किस धातु के बर्तन हुआ करते थे? १०० वर्ष पूर्व तक 'फूल' के बर्तन चलन में थे।
'फूल' के बारे में जानना इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह हमारे शूद्रवर्ग का गौरवान्वित इतिहास है। ऐसे कितने ही क्रियाकल्प हमारे अनुजों द्वारा किये जाते थे।
यह विकिपीडिया से प्राप्त लेखनी अवश्य पढ़ें।आपको ज्ञात होगा कि आज अनुसूचित नामांकित जातियाँ एक समय पर कितनी ज्ञानवान हुआ करती थीं।
आज इसी को 'मॉडर्न' कर पुस्तकों में पढ़ाया जाता है और भारी-भारी शब्द उपयोग कर दिए जाते हैं। उद्योग का पूरा प्रकल्प कई पिछड़ी और मुख्यत: दलित कर दी गई जातियों के हाथ में था।
अंग्रेज़ी शिक्षा पद्धति में उसी सब को milling, coating, dye casting आदि शब्द दे दिए जाते हैं।
Metallurgy, Synthesis, Polymerization इत्यादि के क्षेत्र में किन जातियों का अधिकार था? उपयोगी क्रियासम्पन्न ज्ञान उनके पास होता था।
आज उनसे वह ज्ञान और प्रकल्प छीनकर दलित बना दिया गया है। तथाकथित समदर्शी संविधान के बाद भी स्वतंत्र भारत में चतुर्थवर्ण की दुर्दशा है।
इसलिए अंग्रेज़ी शिक्षा पद्धति के वेग में आकर भारतीय सनातन जातियों को तुच्छ न समझें। ऐसा कोई स्वस्थ प्रकल्प, ज्ञान या कला नहीं जो भारत में नहीं था।
एक-एक जाति स्वयं में शिक्षण संस्थान होती थी जिसमें दशकों से मथा हुआ ज्ञान प्रवाह होता था।
जब तक जन्म से जीविका सुरक्षित नहीं होती तब तक भारत का उत्कर्ष होना असंभव है।
शिक्षा, रक्षा, अर्थ और सेवा के प्रकल्प सबको संतुलितरूप में सुलभ हों, इसकी उच्चतम विधा क्या है? वर्णाश्रमधर्म।

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