कुछ क्षणों के लिए मानकर चलते हैं कि क्षत्रियभूषण सिद्धार्थ गौतम ही भगवान बुद्ध थे।
निष्पक्षरूप से उपस्थित प्रमाणों के आधार पर भगवान बुद्ध ब्राह्मण कुल में ही सिद्ध होते हैं।
फिर भी न्याय की दृष्टि से मान लेते हैं कि किसी-न-किसी कल्प में भगवान बुद्ध क्षत्रिय कुल में हुए होंगे।
निष्पक्षरूप से उपस्थित प्रमाणों के आधार पर भगवान बुद्ध ब्राह्मण कुल में ही सिद्ध होते हैं।
फिर भी न्याय की दृष्टि से मान लेते हैं कि किसी-न-किसी कल्प में भगवान बुद्ध क्षत्रिय कुल में हुए होंगे।
बौद्धों के ग्रंथ में लिखा है कि बौद्धावतार केवल ब्राह्मण या क्षत्रिय कुल में होता है।
पूर्वज, महापुरुष या देश की धरोहर होने की भांति सिद्धार्थ गौतम के प्रति अपनत्व और सम्मान रखिए। इसमें कोई दोष नहीं है।
पूर्वज, महापुरुष या देश की धरोहर होने की भांति सिद्धार्थ गौतम के प्रति अपनत्व और सम्मान रखिए। इसमें कोई दोष नहीं है।
सारी बात अनुगमन और सिद्धांत के अनुपालन की है। बौद्धों का सिद्धांत जीवन में उतारने योग्य नहीं है। क्योंकि बुद्ध विष्णुअवतार भगवान हैं इसलिए उनके प्रति आदर रखें किंतु इतना अवश्य रहे कि लोकाचारपालन में श्रीराम को माने।
बुद्ध का मार्ग जो मानेगा वह किसी और की नहीं अपनी ही हानि करेगा।
बुद्ध का मार्ग जो मानेगा वह किसी और की नहीं अपनी ही हानि करेगा।
जिसे स्वयं के अस्तित्व को नष्ट करना हो वह बुद्ध के मार्ग पर चले।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला दूसरों की तो क्या अपनी रक्षा नहीं कर सकता।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला शासन नहीं कर सकता। बुद्ध का मार्ग है निवृत्तीपरायण का है अथवा राज्य, महल, सुविधाएं सभी कुछ दुखाप्रद हैं।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला दूसरों की तो क्या अपनी रक्षा नहीं कर सकता।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला शासन नहीं कर सकता। बुद्ध का मार्ग है निवृत्तीपरायण का है अथवा राज्य, महल, सुविधाएं सभी कुछ दुखाप्रद हैं।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला मूर्ति पूजा से विमुख होगा ही अन्यथा वह बुद्ध का सच्चा चाकर नहीं है।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला समस्त वैदिक कर्मकाण्ड से विमुख हो जाता है और केवल ध्यान के आश्रय अपना कल्याण करना चाहता है।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला समस्त वैदिक कर्मकाण्ड से विमुख हो जाता है और केवल ध्यान के आश्रय अपना कल्याण करना चाहता है।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला कोई सच्चा अनुयाई होगा तो वह भगवान नाम जप भी नहीं करेगा। केवल बुद्धियुक्त ध्यान पर निर्भर रह जाते हैं।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला सत्कर्मों के बाद भी स्वर्ग की प्राप्ति नहीं कर सकता क्योंकि ऐसी वृत्ति बनेगी नहीं और तदनुकूल कर्मों का फल भोग नहीं सकते।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला सत्कर्मों के बाद भी स्वर्ग की प्राप्ति नहीं कर सकता क्योंकि ऐसी वृत्ति बनेगी नहीं और तदनुकूल कर्मों का फल भोग नहीं सकते।
बुद्ध के मार्ग पर चलने वाला 'बोधिसत्त्व' को प्राप्त करने की चाह रखेगा।
इससे श्रीराम और श्रीकृष्ण जन्मजात भगवान अमान्य हो जाएंगे क्योंकि बुद्ध का सिद्धांत कहता है जिसने बोधिसत्त्व को प्राप्त कर लिया वह भगवान (दिव्यपुरुष) है।
इससे श्रीराम और श्रीकृष्ण जन्मजात भगवान अमान्य हो जाएंगे क्योंकि बुद्ध का सिद्धांत कहता है जिसने बोधिसत्त्व को प्राप्त कर लिया वह भगवान (दिव्यपुरुष) है।
इससे भयंकर दिशाहीनता आयेगी और श्रीराम आदि को व्यक्ति दिव्यावस्था को प्राप्त महापुरुषमात्र समझने लगेंगे।
वेद कहते हैं जो बुद्धि से चले वह पशु है और मनुष्य वह है जो शास्त्रों द्वारा चले। रामायण में बुद्ध के मार्ग पर चलने वालों को दण्ड देने को कहा गया है।
वेद कहते हैं जो बुद्धि से चले वह पशु है और मनुष्य वह है जो शास्त्रों द्वारा चले। रामायण में बुद्ध के मार्ग पर चलने वालों को दण्ड देने को कहा गया है।
हम भी भगवान बुद्ध के प्रति सम्मान और आस्था रखते हैं किंतु उनसे ही कह देते हैं भगवन आपका मार्ग अनुगमन करने योग्य नहीं है और यही आपकी शिक्षा थी।
इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और माता सीता से अच्छा आदर्श कोई हो नहीं सकता। इसी से लोक और परलोक संवरते हैं।
इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और माता सीता से अच्छा आदर्श कोई हो नहीं सकता। इसी से लोक और परलोक संवरते हैं।
बौद्ध मानते हैं कि वैराग्य से दुःख होता है और उसी दुख का अनुभव करके व्यक्ति अंत में सत्तव को प्राप्त करता है।
जबकि वैदिक सिद्धांत कहता है कि वैराग्य से शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है, वैराग्य ज्यों-ज्यों जीवन में उदय होता है व्यक्ति प्रतिक्षण आनंद का अनुभव करता है।
जबकि वैदिक सिद्धांत कहता है कि वैराग्य से शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है, वैराग्य ज्यों-ज्यों जीवन में उदय होता है व्यक्ति प्रतिक्षण आनंद का अनुभव करता है।
इसलिए हमारे भगवान आनंदास्वरूप हैं। अतः हमारे सच्चिदानंद सर्वेश्वर का नाम परमानंद (परम्+आनंद) भी है। जिसके नाममात्र से दुःख दूर हो जाएँ ऐसे ईश्वर को पकड़िए।
इन नवयुगी लामाओं को छोड़ दीजिए किंतु जो वास्तव में बुद्ध के मार्ग पर चलेगा वह दुखी रहता है।
इन नवयुगी लामाओं को छोड़ दीजिए किंतु जो वास्तव में बुद्ध के मार्ग पर चलेगा वह दुखी रहता है।
जो बुद्धि तक जाकर शिथिल (मंद) पड़ जाए वह जड़ है अथवा मिथ्या है। बुद्धि से अतिक्रांत जो तत्व है वही सत्य है।
इसलिए बोधिसत्त्व का लोभ त्यागकर सनातन सच्चिदानंद सर्वेश्वर भगवान के श्रीचरणों में आश्रय मिले और मोक्ष प्राप्त हो, ऐसे मार्ग पर चलना चाहिए।
इसलिए बोधिसत्त्व का लोभ त्यागकर सनातन सच्चिदानंद सर्वेश्वर भगवान के श्रीचरणों में आश्रय मिले और मोक्ष प्राप्त हो, ऐसे मार्ग पर चलना चाहिए।
ध्यान देने की बात यह है कि धारणा के कारण जिसका अधिक चिंतन करते हैं या जिसके प्रति नमस्तु बुद्धि रखते हैं वैसा ही मन ध्येयाकार हो जाता है। इसलिए कब व्यक्ति स्वयं विपरीत मार्ग पर निकल जाते हैं उन्हें भी बोध नहीं होता।
यह पूरा विश्व जानता है और बौद्ध स्वयं कहते हैं कि वे अनीश्वरवादी हैं।
यही बौद्धों का सिद्धांत है। फिर साथ में श्रीराम और श्रीकृष्ण को भगवान कैसे मान पाएंगे? किसी एक के साथ विश्वासघात है।
बुद्धपरस्त होने के कारण देश परतंत्र हुआ और विधर्मी हम पर आक्रमण कर शासन करने में सफ़ल हुए।
यही बौद्धों का सिद्धांत है। फिर साथ में श्रीराम और श्रीकृष्ण को भगवान कैसे मान पाएंगे? किसी एक के साथ विश्वासघात है।
बुद्धपरस्त होने के कारण देश परतंत्र हुआ और विधर्मी हम पर आक्रमण कर शासन करने में सफ़ल हुए।
प्राय: यह भ्रम है कि केवल क्षत्रिय ही बौद्ध बने, ऐसा नहीं है बुद्ध की मंडली में प्रमुख ब्राह्मण भी थे।
उसके उपरांत उच्चकुलीन ब्राह्मण नागार्जुन (जिन्हें दूसरा बुद्ध कहा जाता है) ने जब बौद्ध शास्त्रों को छू लिया तबसे बौद्धमत फलता-फूलता चला गया।
उसके उपरांत उच्चकुलीन ब्राह्मण नागार्जुन (जिन्हें दूसरा बुद्ध कहा जाता है) ने जब बौद्ध शास्त्रों को छू लिया तबसे बौद्धमत फलता-फूलता चला गया।
इसलिए बलिहारी इसी बात की है अभिमान को त्यागकर बुद्ध के प्रति सम्मान रखते हुए इस मार्ग का परित्याग हो। बुद्ध का महिमामंदन श्रीराम के मार्ग के विरुद्ध है।
पूर्वपक्ष से उत्तरपक्ष को आरूढ़ करने की शिक्षा ली जाती है न कि पूर्वपक्ष को ही सत्यपक्ष मानकर प्रचिलित कर दिया जाए।
पूर्वपक्ष से उत्तरपक्ष को आरूढ़ करने की शिक्षा ली जाती है न कि पूर्वपक्ष को ही सत्यपक्ष मानकर प्रचिलित कर दिया जाए।
श्रीरामभद्र सभी का कल्याण करें। जय श्रीराम।
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