मंदिर में एक दिन एकत्रित होकर भगवान का संकीर्तन, हनुमान चालीसा का पाठ इत्यादि अवश्य करें और धर्मवित् शिक्षा का आदान-प्रदान करें। कुछ दिन मंदिर में जाएं और वहां का वातावरण देखें, किस प्रकार के व्यक्ति आते हैं और कितने व्यक्ति वास्तव में धार्मिक शासन में हाथ बटा सकते हैं।
प्रथम- चयन (Selection)
द्वितीय- प्रशिक्षण (Training)
तृतीय- नियोजन (Deployment)
चतुर्थ- क्रियान्वयन (Execution)
द्वितीय- प्रशिक्षण (Training)
तृतीय- नियोजन (Deployment)
चतुर्थ- क्रियान्वयन (Execution)
ध्यान रहे मनोकल्पीत शिक्षा नहीं देनी, शास्त्रों का ही विस्तार करना है। हिंदी की गिनती, वर्णमाला सिखाएं/सीखने को कहें जिसमें थोड़ा ही समय लगेगा। अपने महान इतिहास के बारे में बताएं। चोला, विजयनगर, कण्व, सातवाहन, गुप्ता, मौर्य, सिसोदिया, सोलंकी आदि साम्राज्यों के बारे में बताएं।
उनके शासन में क्या दिव्यता थी और किस कारण से थी उन तथ्यों को उद्धरित करें।
महाभारत में वर्णित अनेकों अनेक कूटनीति और व्युहरचना का विस्तार करें और बताएं किस प्रकार से उन्हें आज गढ़ सकते हैं।
इस सब के लिए पहले स्वयं भी ज्ञानवान निपुण होना आवश्यक है।
महाभारत में वर्णित अनेकों अनेक कूटनीति और व्युहरचना का विस्तार करें और बताएं किस प्रकार से उन्हें आज गढ़ सकते हैं।
इस सब के लिए पहले स्वयं भी ज्ञानवान निपुण होना आवश्यक है।
समाज को दिशा तब दिखा पाएंगे जब स्वयं दिशा पता हो।
अपने क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा करें और उनके निवारण को लेकर मंथन कर योजनाएं बनाएं।
किसी राजनीतिक दल आदि के समर्थन या विरोध की बातें नहीं करनी है। जीव का स्वभाव होता है सत्य का पक्ष लेना।
अपने क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा करें और उनके निवारण को लेकर मंथन कर योजनाएं बनाएं।
किसी राजनीतिक दल आदि के समर्थन या विरोध की बातें नहीं करनी है। जीव का स्वभाव होता है सत्य का पक्ष लेना।
सत्य को उनके हृदय तक पहुंचाने पर वे स्वताः सही मार्ग का अनुगम करने लगेंगे।
राजनीति का पर्याय अर्थनीति भी होता है। प्रति व्यक्ति से प्रतिदिन एक रुपए लें और उस क्षेत्र को विकसित करने के लिए उपयोग करें।
राजनीति का पर्याय अर्थनीति भी होता है। प्रति व्यक्ति से प्रतिदिन एक रुपए लें और उस क्षेत्र को विकसित करने के लिए उपयोग करें।
शूद्र वर्ग के बंधुओं की कहीं उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। हर प्रकल्प में उनकी भी आवश्यकता अनुसार सहभागिता बनी रहे।
यह सब एक दिन में या एक महीने में नहीं होगा। आपके मस्तिष्क में पहले पूरी रूप रेखा बन जानी चाहिए। ईश्वर की कृपा से क्रियान्वयन भी हो ही जाएगा। यदि सोचेंगे बहुत बड़ा कार्य है कब होगा कैसे होगा फिर भूल जाइए।
आरंभ में गति न्यून रहेगी, धीरे धीरे द्रुतगति पकड़ेगा अभियान। बस पीछे मुड़कर न देखें। बूंद-बूंद से कब सागर बन जाएगा आपको भी नहीं पता चलेगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात 'एक-एक शब्द' को दर्शन, विज्ञान और व्यवहार में सामंजस्य स्थापित कर रखें। इसके लिए सबसे अधिक स्वयं के ऊपर कार्य करना होगा। शब्दों में बहुत शक्ति होती है, इन्हीं से सृष्टि बनती है। इसलिए कोई भी बात ऐसी न निकले जो राग, द्वेष, कोरी भावुकता, क्रोध, विवेक मूलक हो।
असफ़ल होने का कोई प्रश्न ही नहीं है। भगवान आपका कल्याण करें।
राम राम।
राम राम।
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