जगद्गुरु शंकराचार्य जी समझाते हैं अन्य किसी तंत्र, मज़हब, पंथ या रिलीजन में यदि कोई दिव्यता है तो वह सनातनी हिंदुओ की देन है। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हमारे वेद-शास्त्रों का कुछ अंश प्रत्येक तंत्र ने लिया है। जो उन्माद और अधर्म है वह उनके मस्तिष्क की संरचना है।
हमारे पास संस्कार हैं उनके पास संस्कार और विकार दोनो हैं। मनोकल्पित विधा से किसी भी नीति या व्यवस्था का क्रियान्वयन करने जाओगे विस्फोट हो जाएगा। केवल शत-प्रतिशत वेदादिशास्त्रों का मार्ग ही स्वस्थ व्यक्ति और समाज को उद्भाषित कर सकता है।
हो सकता है आप इसको गलत रूप में समझ मेरा विरोध करें लेकिन इस दर्शन के आधार पर यह समझा जा सकता है कि अहिंदु जैसे मुस्लिम आदि तंत्रों में जो भी बाहुबल, पराक्रम या विस्तार है वह सभी हिंदुओ की देन है। उन्हें ऐसा शक्तिशाली बनने के लिए हमारा ही आलंबन लेना पड़ा था।
अत: केवल हिंदु ब्राह्मण क्षत्रिय आदि अन्य परंपाराप्राप्त जातियों की स्त्रियों में ही क्षमता होती है तेज़, वीरता, शौर्य से युक्त बालक को जन्म दे सकें। शास्त्रों में कई बार आया है पिता का प्रभाव संतान पर पड़े न पड़े लेकिन माता का प्रभाव अवश्य ही पड़ता है।
किसी भी संस्कृति के मूल में स्त्रियां ही होती हैं। साधारण सी बात है आचारविचारहीन दुर्व्यस्नी स्त्री कभी अधिपति वल्लभ संतानोत्पत्ति नहीं कर सकती। यदि आप समझें तो यही हिंदुओ के पतन का कारण है। सतीद्वार से ही आर्यबट्ट, विष्णुगुप्त, विक्रमादित्य, महाराणा जैसी प्रतापी संताने संभव हैं।
ध्यान देने की आवश्यकता है अंतरजातिय व अन्य पंथविवाह से दिव्य आत्माओं के शरीर ग्रहण का अवसर अवरूद्ध हो जाता है।
आतताई आक्रांताओं से बचने के लिए राजस्थान की देवियों ने जौहर करके युद्ध में सबसे बड़ा योगदान दिया था
आतताई आक्रांताओं से बचने के लिए राजस्थान की देवियों ने जौहर करके युद्ध में सबसे बड़ा योगदान दिया था
अथवा विधर्मीयों के लिए पराक्रमी संताने उत्पन्न करने का मार्ग बाधित कर दिया था। उन देवियों को नमन।
इसलिए ही सांकेतिक रूप में पुज्यपाद शंकराचार्य जी महाराज ने सौ बार कहा है हमारा (हिंदुओ) प्रमाद ही अन्य तंत्रों का जीवन है।
इसलिए ही सांकेतिक रूप में पुज्यपाद शंकराचार्य जी महाराज ने सौ बार कहा है हमारा (हिंदुओ) प्रमाद ही अन्य तंत्रों का जीवन है।
किसी तंत्र या वाद की दाल नहीं गल सकती यदि हिंदुओ अपने मौलिक स्वरूप में प्रस्थापित हो जाए।
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