“सकल-उत्तरपथ-नाथ” सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट हर्षवर्धन बैस और प्रयाग कुंभ मेला।
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कुंभ आस्था, संस्कृति और करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा का संगम है। महाकुंभ का आरंभ इस वर्ष 13 जनवरी से होने जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस साल लगने वाला कुंभ पूर्ण महाकुंभ होगा जो 144 साल बाद लग रहा है। इसका इतिहास वर्षों पुराना है। x.com
तीर्थराज प्रयाग में लगने वाले महाकुंभ का महत्व अधिक माना गया है। दरअसल, यहां तीन पवित्र नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। जिस वजह से यह स्थान अन्य जगहों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है। बता दें सरस्वती नदी लुप्त हो चुकी हैं लेकिन, वह धरती का धरातल में आज भी बहती हैं। x.com
ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति इन तीन नदियों के संगम में स्नान करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए तीर्थराज प्रयाग में इसका महत्व अधिक माना जाता है। x.com
चीनी यात्री ह्वेन त्सांग सातवीं शताब्दी ईस्वी में भारत आए थे। उन्होंने अपने संसमरणों (Si-yu-ki) में कुंभ का वर्णन करते हुए सम्राट हर्षवर्धन बैस के राज्यकाल के छठे पंचवार्षिक धर्मसभा (643 ईसवी) के दान का विस्तृत वर्णन करते हुए लिखा है। x.com
प्रत्यक्षदर्शी ह्वेनसांग के अनुसार सम्राट हर्षवर्धन बैस एक “दान के क्षेत्र” का निर्माण करते थे जिसके उत्तर में गंगा नदी और दक्षिण में यमुना नदी बहती है। ह्वेनसांग के अनुसार प्रयाग में कम मात्रा में दान करना भी बाकी तीर्थों पर 1000 स्वर्ण मुद्राएं दान करने से भी अधिक लाभदायक था। x.com
इस क्षेत्र में सम्राट हर्षवर्धन बैस दान में अपना राजकोष एकत्रित थे। इसके साथ ही वे सोना, चांदी, मोती, इंद्रनील मणि, महानील मणि आदि भी एकत्रित करते थे। इस क्ष्रेत्र के कोने में कई भंडार गृह भी होते थे जिनमें दान के लिए अनाज के साथ-साथ वस्त्रों की व्यवस्था रहती थी। x.com
इस “दान क्षेत्र” के बाड़े के पास ही अस्थायी रूप से धर्मशालाओं अथवा रैनबसेरों का निर्माण होता था जिसमें श्रद्धालुओं के ठहरने और भोजन का प्रबंध भी रहता था। x.com
सम्राट हर्षवर्धन बैस स्वयं दानक्षेत्र में आकर चारों दिशाओं के श्रमण, बौद्ध, जैन, ब्राह्मण के साथ-साथ निर्धन-निराश्रित लोगों, अनाथ बच्चों और अन्य असहाय लोगों को दान के लिए आमंत्रण संदेश भेजते थे। x.com
सम्राट हर्षवर्धन बैस का शिविर गंगा नदी के उत्तरी छोर पर लगता था तो वही राजा ध्रुवभट्ट (गुजरात के राजा ध्रुवसेन) का शिविर संगम के पश्चिम में लगता था। राजा कुमारराज (असम के राजा कुमार भास्करवर्मन) का शिविर यमुना नदी के दक्षिण में लगता था। x.com
सम्राट हर्षवर्धन के आदेश पर तीनों राजा अपने सैन्य अधिकारियों के साथ दल-बल में दानक्षेत्र के लिए प्रस्थान करते थे जिसमें शिष्टाचार स्वरूप 18 अलग-अलग राजा भी भाग लेते थे। x.com
पहले दिन दानक्षेत्र में गौतमबुद्ध की एक प्रतिमा स्थापित की जाती थी और अनमोल उपहारों के साथ उच्चतम स्तर के वस्त्र आदि दान में दिए जाते थे। दान के लिए आए श्रद्धालुओं के ऊपर पुष्प वर्षा भी की जाती थी। इसके बाद सभी राजा अपने-अपने शिविर में लौट जाते थे। x.com
दान के दूसरे दिन दानक्षेत्र में भगवान आदित्य (भगवान सूर्य) की प्रतिमा स्थापित होती थी और कई अनमोल वस्तुएँ दान में दी जाती थी। दान के तीसरे दिन ईश्वरदेव (भगवान शिव) की प्रतिमा दानक्षेत्र में स्थापित होती थी और कई सारे दान किए जाते थे। x.com
दान के चौथे दिन विभिन्न संप्रदयों के दस सहस्र अनुयायियों को एक सौ की पंक्ति में व्यवस्थित कर के हर अनुयायी को सोने के सौ सिक्के, एक मोती, एक उच्चतम स्तर के सूती वस्त्र के साथ-साथ इत्र व अन्य उपहार दिए जाते थे। x.com
दान के पाँचवे दिन ब्राह्मणों को दान दिया जाता था। ब्राह्मणों को दान देने का कार्यक्रम बीस दिनों तक चलता था।
इसके बाद स्वमतावलंबियों को दान दिया जाता था। यह कार्यक्रम दस दिनों तक चलता था। x.com
इसके बाद स्वमतावलंबियों को दान दिया जाता था। यह कार्यक्रम दस दिनों तक चलता था। x.com
इसके बाद दूर से आए हुए श्रद्धालुओं को दान दिए जाते थे, जिसका कार्यक्रम दस दिनों तक चलता था।
इसके बाद निर्धन, असहाय, निराश्रित लोगों और अनाथ बच्चों को दान दिए जाते थे। यह कार्यक्रम एक मास तक चलता था। x.com
इसके बाद निर्धन, असहाय, निराश्रित लोगों और अनाथ बच्चों को दान दिए जाते थे। यह कार्यक्रम एक मास तक चलता था। x.com
इतने दान दिए जाने पर प्रत्यक्षदर्शी ह्वेनसांग लिखते हैं:- “इस समय तक पाँच वर्षों की संचित धन-संपदा समाप्त हो चुकी थी, सेना के संधारण और राजसी सम्पदा के अनुरक्षण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बचा था।” x.com
यहाँ तक कि सम्राट हर्षवर्धन अपने पहने हुए सोने चांदी की माला, आभूषण, कंगन और फूलों का हार भी स्वेच्छा से दान कर देते थे और अंत में अपना सब कुछ दान में देकर अपनी बहन राज्यश्री से एक पुराना साधारण श्वेत वस्त्र माँगकर पहन लेते थे। x.com
अंत में सम्राट हर्षवर्धन कहते हैं:- “यह सारी संपत्ति इकट्ठा करने में हमको कभी कभी यह भय होता था कि इसे सुरक्षित रूप से किसी भंडार में संग्रहीत नहीं किया गया है; लेकिन अब इस संपत्ति को धार्मिक कार्य के क्षेत्र में सर्वस्व दान करने के बाद, + x.com
+ हम सुरक्षित रूप से कह सकते हैं कि यह अच्छे कार्य के लिए प्रदान किया गया है। ओह, काश हम (शीलादित्य) अपने भविष्य के सभी जन्मों में भी इसी प्रकार अपनी धन संपत्ति को धार्मिकतापूर्वक मानव जाति को दान में दे पाते।” x.com
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