6. पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:॥
(नवम अध्याय, श्लोक 26)
अर्थ:– जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्ती, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्ती-पुष्पादि मैं सद्गुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:॥
(नवम अध्याय, श्लोक 26)
अर्थ:– जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्ती, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्ती-पुष्पादि मैं सद्गुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ।
8. मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कारु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
(अठारहवां अध्याय, श्लोक 65)
अर्थ: हमेशा मेरा ही चिंतन करो और मेरे भक्त बनो। मेरी पूजा करो और मुझे प्रणाम करो। इस प्रकार तुम अवश्य ही मेरे पास आओगे। मैं तुमसे यह वादा करता हूँ क्योंकि तुम मेरे बहुत प्रिय मित्र हो।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
(अठारहवां अध्याय, श्लोक 65)
अर्थ: हमेशा मेरा ही चिंतन करो और मेरे भक्त बनो। मेरी पूजा करो और मुझे प्रणाम करो। इस प्रकार तुम अवश्य ही मेरे पास आओगे। मैं तुमसे यह वादा करता हूँ क्योंकि तुम मेरे बहुत प्रिय मित्र हो।
9. न जायते मृयते वा कदाचि-नान्यां भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
(दूसरा अध्याय, श्लोक 20)
अर्थ: आत्मा न कभी जन्म लेती है और न मरती है। न यह उत्पन्न हुई है, न उत्पन्न होगी। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
(दूसरा अध्याय, श्लोक 20)
अर्थ: आत्मा न कभी जन्म लेती है और न मरती है। न यह उत्पन्न हुई है, न उत्पन्न होगी। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।
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