Read Secrets of your जन्मकुंडली by your own
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ब्रह्माण्ड को, कालपुरुष को जिस प्रकार 12 राशियों में बांटा गया है उसी प्रकार काल पुरुष को 12 भावों में भी बांटा गया है। भाव स्थिर है। प्रथम भाव को लग्न (lagan) कहा जाता है। जातक के जन्म के समय पूर्व में जो राशि उदित (rise) होती है उस राशि की संख्या को लग्न या प्रथम में लिखा जाता है। उसके बाद क्रमशः उदय होने वाली राशियों को द्वितीय, तृतीय भाव में लिखा जाता है। भाव पूर्व से उत्तर पश्चिम दिशा में चलते हैं, इसको विपरीत घड़ी गति भी कह सकते हैं। वह ग्रह जो किसी भाव के कार्य को करता है उसे उस भाव का कारक ग्रह कहते हैं। भाव के कार्य को भाव का कारकत्व कहते है।
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ब्रह्माण्ड को, कालपुरुष को जिस प्रकार 12 राशियों में बांटा गया है उसी प्रकार काल पुरुष को 12 भावों में भी बांटा गया है। भाव स्थिर है। प्रथम भाव को लग्न (lagan) कहा जाता है। जातक के जन्म के समय पूर्व में जो राशि उदित (rise) होती है उस राशि की संख्या को लग्न या प्रथम में लिखा जाता है। उसके बाद क्रमशः उदय होने वाली राशियों को द्वितीय, तृतीय भाव में लिखा जाता है। भाव पूर्व से उत्तर पश्चिम दिशा में चलते हैं, इसको विपरीत घड़ी गति भी कह सकते हैं। वह ग्रह जो किसी भाव के कार्य को करता है उसे उस भाव का कारक ग्रह कहते हैं। भाव के कार्य को भाव का कारकत्व कहते है।
कारक ग्रह
1. प्रथम भाव ,तनु भाव ,सूर्य चन्द्र
2. द्वितीय भाव ,धन भाव ,बृहस्पति, बुध
3. तृतीय भाव, सहज भाव मंगल, शनि
4. चतुर्थ भाव ,सुख भाव ,चन्द्रमा बुध, शुक्र
5. पंचम भाव ,पुत्र भाव ,बृहस्पति
6. षष्ठ भाव ,शत्रु भाव मंगल, शनि बु.
7. सप्तम भाव, कलत्र भाव ,शुक्र
8. अष्टम भाव, आयु भाव ,रंध्र शनि
9. नवम भाव धर्म, भाग्य, पितृ भाव बृ. सू.
10. दशम भाव, कर्म भाव, बु.सू.श. - वृ.मं.
11. एकादश भाव, लाभ भाव, बृहस्पति
12. द्वादश भाव, व्यय भाव ,शनि, शुक्र
अन्य ज्योतिष विद्वानों ने मत के अन्य कारक भी माने हैं जैसे- प्रथम भाव का कारक सूर्य के साथ चन्द्रमा भी है। द्वितीय भाव का कारक बुध वर्णा पटुता के कारण, तृतीय भाव का शनि-आयु कारक, चतुर्थ भाव का शुक्र-वाहन का कारक, षष्ठ भाव का बुध- मामा का कारक, दशम भाव का मंगल - पराक्रम, तकनीकी शिक्षा, प्रतियोगता का कारक तथा द्वादश भाव का शुक्र काम का कारक ग्रह भी माना है।
1. प्रथम भाव ,तनु भाव ,सूर्य चन्द्र
2. द्वितीय भाव ,धन भाव ,बृहस्पति, बुध
3. तृतीय भाव, सहज भाव मंगल, शनि
4. चतुर्थ भाव ,सुख भाव ,चन्द्रमा बुध, शुक्र
5. पंचम भाव ,पुत्र भाव ,बृहस्पति
6. षष्ठ भाव ,शत्रु भाव मंगल, शनि बु.
7. सप्तम भाव, कलत्र भाव ,शुक्र
8. अष्टम भाव, आयु भाव ,रंध्र शनि
9. नवम भाव धर्म, भाग्य, पितृ भाव बृ. सू.
10. दशम भाव, कर्म भाव, बु.सू.श. - वृ.मं.
11. एकादश भाव, लाभ भाव, बृहस्पति
12. द्वादश भाव, व्यय भाव ,शनि, शुक्र
अन्य ज्योतिष विद्वानों ने मत के अन्य कारक भी माने हैं जैसे- प्रथम भाव का कारक सूर्य के साथ चन्द्रमा भी है। द्वितीय भाव का कारक बुध वर्णा पटुता के कारण, तृतीय भाव का शनि-आयु कारक, चतुर्थ भाव का शुक्र-वाहन का कारक, षष्ठ भाव का बुध- मामा का कारक, दशम भाव का मंगल - पराक्रम, तकनीकी शिक्षा, प्रतियोगता का कारक तथा द्वादश भाव का शुक्र काम का कारक ग्रह भी माना है।
ग्रहों के कारकत्व ग्रहों को भी नैसर्गिक कुछ काम सौंपे गये हैं। उनका भी विचार करना आवश्यक है।
सूर्य आत्मा, अहम्, सहानुभूति प्रभाव, यश, स्वास्थ्य, दाएँ नेत्र, दिन, ऊर्जा, पिता, राजा, राजनीति, चिकित्सा विज्ञान गौरव, पराक्रम का कारण है।
चन्द्रमा मन, रुचि, सम्मान, निद्रा, प्रासन्नता, माता, सत्ता, धन, यात्रा, जल का कारक है।
मंगल शक्ति, साहस, पराक्रम, प्रतियोगता, क्रोध, उत्तेजना, षडयन्त्र, शत्रु, विपक्ष विवाद, शस्त्र, सेनाध्यक्ष, युद्ध दुर्घटना जलना, घाव, भूमि, अचल सम्पत्ति छोटा भाई, चाचा के लड़के, नेता, पुलिस सर्जन, मैकेनिकल इंजीनियर का कारक है।
बुध बुद्धिमता, वाणी पटुता तर्क अभिव्यक्ति, शिक्षा, शिखण, गणित डाकिया, ज्योतिषी, लेखाकार, व्यापार, कमीशन एजेंट, प्रकाशन राजनीति में मध्यवर्ती व्यक्ति (विचोला नृत्य, नाटक, वस्तुओं का मिश्रण पत्तेवाले पेड़, मूल्यवान पत्थरों की परीक्षा मामा, मित्र सम्बन्धि आदि।
बृहस्पति विवेक, बुद्धिमता, शिक्षण, शरीर की मांसलता, धार्मिक कार्य ईश्वर के प्रति निष्ठा, बड़ा भाई, पवित्र स्थान, दार्शनिकता, धार्मिक ग्रन्थों का पठन, पाठन, गुरु, अध्यापक, धन बैंक, तीना कम्पनियां, दान देना, परोपकार फलदार वृक्ष, पुत्र आदि ।
शुक्र पति/पत्नी, विवाह, रतिक्रिया, प्रम सम्बन्ध, संगीत, काव्य, इत्र सुगन्ध, घर की सजावट ऐश्वर्य, दूसरों के साथ सहयोग, फूल फूलदार वृक्ष, पौधे सौंदर्य, आखों की रोशनी, आभूषण, जलीय स्थान, सिल्कन कपड़ा, सफेद रंग, वाहन, शयन कक्ष आदि सुख सामग्री आदि।
शनि आयु, दुख, रोग, मृत्यु संकट अनादर, गरीबी, आवजीवका, अनैतिक तथा अधार्मिक कार्य, विदेशी भाषा, विज्ञान तथा तकनीकी शिक्षा मेहनत वाले कार्य, कृषीगत व्यवसाय, लोहा, तेल, खनिज पदार्थ, कर्मचारी, सेवक नौकरियां, योरी, क्रूर कार्य, वृद्ध मन्ति, पंगुता, अंग-भंग, लोभ, लालच बिस्तरे पर पड़े रहना, चार दिवाने में बन्द रहना, जेल, हास्पीटल में पड़े रहना, वायु, जोड़ों के दर्द, कठोर वाणी आदि।
राहु दादा का कारक ग्रह है। कठोर वाणी, जुआ, भ्रामक तर्क, गतिशीलता, यात्राएं, विजातीय लोग, विदेशी लोग, विष, चोरी, दुष्टता, विधवा, त्वचा की बिमारियां होठ, धार्मिक यात्राएं दर्द आदि।
केतु नाना का कारक ग्रह है। दर्द, ज्वर, घाव, शत्रुओं को नुकसान पहुंचाना, तांत्रिक तन्त्र, जादू-टोना, कुत्ता, सींग वाले पशु, बहुरंगी पक्षी, मोक्ष का कारक ग्रह है।
इनका क्या लाभ है मानो हम चतुर्थ भाव का विश्लेषण कर रहे हैं। चतुर्थ भाव तथा चतुर्थेश पीड़ित है। चतुर्थ भाव वाहन, सुख, अचल सम्पत्ति, भूमि, शिक्षा तथा माता को दर्शाता है, किसको कष्ट होगा या किसके द्वारा कष्ट प्राप्त होगा? इसका निर्णय कारक ग्रह करता है। यदि चतुर्थ भाव तथा भावेश के साथ चन्द्रमा पीड़ित है तो माता को कष्ट, शुक्र पीड़ित है तो वाहन के द्वारा कष्ट, बुध पीड़ित है तो शिक्षा में कष्ट होता है। इस प्रकार घटना का सम्बन्ध भाव, भावेश तथा कारक ग्रह से होता है।
सूर्य आत्मा, अहम्, सहानुभूति प्रभाव, यश, स्वास्थ्य, दाएँ नेत्र, दिन, ऊर्जा, पिता, राजा, राजनीति, चिकित्सा विज्ञान गौरव, पराक्रम का कारण है।
चन्द्रमा मन, रुचि, सम्मान, निद्रा, प्रासन्नता, माता, सत्ता, धन, यात्रा, जल का कारक है।
मंगल शक्ति, साहस, पराक्रम, प्रतियोगता, क्रोध, उत्तेजना, षडयन्त्र, शत्रु, विपक्ष विवाद, शस्त्र, सेनाध्यक्ष, युद्ध दुर्घटना जलना, घाव, भूमि, अचल सम्पत्ति छोटा भाई, चाचा के लड़के, नेता, पुलिस सर्जन, मैकेनिकल इंजीनियर का कारक है।
बुध बुद्धिमता, वाणी पटुता तर्क अभिव्यक्ति, शिक्षा, शिखण, गणित डाकिया, ज्योतिषी, लेखाकार, व्यापार, कमीशन एजेंट, प्रकाशन राजनीति में मध्यवर्ती व्यक्ति (विचोला नृत्य, नाटक, वस्तुओं का मिश्रण पत्तेवाले पेड़, मूल्यवान पत्थरों की परीक्षा मामा, मित्र सम्बन्धि आदि।
बृहस्पति विवेक, बुद्धिमता, शिक्षण, शरीर की मांसलता, धार्मिक कार्य ईश्वर के प्रति निष्ठा, बड़ा भाई, पवित्र स्थान, दार्शनिकता, धार्मिक ग्रन्थों का पठन, पाठन, गुरु, अध्यापक, धन बैंक, तीना कम्पनियां, दान देना, परोपकार फलदार वृक्ष, पुत्र आदि ।
शुक्र पति/पत्नी, विवाह, रतिक्रिया, प्रम सम्बन्ध, संगीत, काव्य, इत्र सुगन्ध, घर की सजावट ऐश्वर्य, दूसरों के साथ सहयोग, फूल फूलदार वृक्ष, पौधे सौंदर्य, आखों की रोशनी, आभूषण, जलीय स्थान, सिल्कन कपड़ा, सफेद रंग, वाहन, शयन कक्ष आदि सुख सामग्री आदि।
शनि आयु, दुख, रोग, मृत्यु संकट अनादर, गरीबी, आवजीवका, अनैतिक तथा अधार्मिक कार्य, विदेशी भाषा, विज्ञान तथा तकनीकी शिक्षा मेहनत वाले कार्य, कृषीगत व्यवसाय, लोहा, तेल, खनिज पदार्थ, कर्मचारी, सेवक नौकरियां, योरी, क्रूर कार्य, वृद्ध मन्ति, पंगुता, अंग-भंग, लोभ, लालच बिस्तरे पर पड़े रहना, चार दिवाने में बन्द रहना, जेल, हास्पीटल में पड़े रहना, वायु, जोड़ों के दर्द, कठोर वाणी आदि।
राहु दादा का कारक ग्रह है। कठोर वाणी, जुआ, भ्रामक तर्क, गतिशीलता, यात्राएं, विजातीय लोग, विदेशी लोग, विष, चोरी, दुष्टता, विधवा, त्वचा की बिमारियां होठ, धार्मिक यात्राएं दर्द आदि।
केतु नाना का कारक ग्रह है। दर्द, ज्वर, घाव, शत्रुओं को नुकसान पहुंचाना, तांत्रिक तन्त्र, जादू-टोना, कुत्ता, सींग वाले पशु, बहुरंगी पक्षी, मोक्ष का कारक ग्रह है।
इनका क्या लाभ है मानो हम चतुर्थ भाव का विश्लेषण कर रहे हैं। चतुर्थ भाव तथा चतुर्थेश पीड़ित है। चतुर्थ भाव वाहन, सुख, अचल सम्पत्ति, भूमि, शिक्षा तथा माता को दर्शाता है, किसको कष्ट होगा या किसके द्वारा कष्ट प्राप्त होगा? इसका निर्णय कारक ग्रह करता है। यदि चतुर्थ भाव तथा भावेश के साथ चन्द्रमा पीड़ित है तो माता को कष्ट, शुक्र पीड़ित है तो वाहन के द्वारा कष्ट, बुध पीड़ित है तो शिक्षा में कष्ट होता है। इस प्रकार घटना का सम्बन्ध भाव, भावेश तथा कारक ग्रह से होता है।
१. जन्म कुण्डली में मंगल कहीं पर भी हो, जहां वह बैठा है, वह स्थान उससे चौथे, सातवें तथा दसवें भाव की हानि ही करता है।
२. मिथुन राशि में राहू हो तो वह व्यक्ति राजनीति से संबंधित होता ही है।
३. दशम भाव स्थित शनि अपनी दशा में जीवन के सर्वोच्च पद पर पहुंचाता है।
४. गुरु और शुक्र साथ में बैठे हों तो गुरु दशा में शुक्र की अन्तर्दशा या शुक्र दशा में गुरु की अन्तर्दशा में जेल यात्रा या मान हानि होती ही है।
५. द्वादश भाव में शुक्र स्वराशिस्थ हो तो शुक्र दशा में भौतिक दृष्टि से उसे वह सब कुछ मिल जाता है जो उसकी इच्छा होती है।
६. वक्री ग्रह ज्यादा बलवान एवं कारक होता है।
७. यदि एक ही ग्रह दो केंद्र स्थानों का स्वामी होता है तो वह निर्बल तथा विपरीत फल देने वाला होता है।
८. एक त्रिकोण स्थान का स्वामी यदि दूसरे त्रिकोण स्थान में बैठे तो वह अपनी शुभता खो देता है।
६. चतुर्थ भाव स्थित शनि वृद्धावस्था दुःखमय बनाता है।
१०. लग्न में शुक्र हो तो उसका विवाह निश्चय ही विलंब से होता है।
११. द्वादशेश जिस भाव में भी बैठेगा उस भाव की हानि ही देता है
२. मिथुन राशि में राहू हो तो वह व्यक्ति राजनीति से संबंधित होता ही है।
३. दशम भाव स्थित शनि अपनी दशा में जीवन के सर्वोच्च पद पर पहुंचाता है।
४. गुरु और शुक्र साथ में बैठे हों तो गुरु दशा में शुक्र की अन्तर्दशा या शुक्र दशा में गुरु की अन्तर्दशा में जेल यात्रा या मान हानि होती ही है।
५. द्वादश भाव में शुक्र स्वराशिस्थ हो तो शुक्र दशा में भौतिक दृष्टि से उसे वह सब कुछ मिल जाता है जो उसकी इच्छा होती है।
६. वक्री ग्रह ज्यादा बलवान एवं कारक होता है।
७. यदि एक ही ग्रह दो केंद्र स्थानों का स्वामी होता है तो वह निर्बल तथा विपरीत फल देने वाला होता है।
८. एक त्रिकोण स्थान का स्वामी यदि दूसरे त्रिकोण स्थान में बैठे तो वह अपनी शुभता खो देता है।
६. चतुर्थ भाव स्थित शनि वृद्धावस्था दुःखमय बनाता है।
१०. लग्न में शुक्र हो तो उसका विवाह निश्चय ही विलंब से होता है।
११. द्वादशेश जिस भाव में भी बैठेगा उस भाव की हानि ही देता है
१२. किसी भी भाव में जो ग्रह बैठा है, उसकी अपेक्षा जो ग्रह उस भाव को देख रहा है, उसका प्रभाव ज्यादा होता है।
१३. यदि किसी भाव पर राहू, शनि और मंगल की दृष्टि हो तो इस भाव का लाभ जातक को मिल ही नहीं सकता, क्योंकि ये तीनों ही विच्छेदात्मक ग्रह हैं।
१४. किसी भी स्वराशिस्य ग्रह के साथ केतु बैठा हो तो उस ग्रह के बल में विशेष वृद्धि हो जाती है।
१५. तीसरे, छठे तथा ग्यारहवें भाव के स्वामी जहां भी होंगे, उस भाव की शुभता में क्षीणता ही लायेंगे ।
१६. राहू-केतु जिस ग्रह के साथ बैठेंगे, उस ग्रह के गुणों को अपना लेंगे तथा वैसा ही फल देने लगेंगे ।
१७. सप्तमेश, अष्टमेश की अपेक्षा भी द्वितीयेश प्रवल मारक होता है।
१८. सप्तमेश, अष्टमेश, द्वितीयेश या गुरु अथवा शुक्र की दशा अन्तर्दशा में ही विवाह होने का योग बनता है।
१६. माता को छठे, आठवें, ग्यारहवें या बारहवें चन्द्र आने पर ही संतान जन्म लेती है।
२०. गोचर में जव दशम भाव में मंगल आता है, तब पतन, स्थानान्तरण या हानि होती है।
२१. जन्म कुण्डली में जो केंद्र बिंदु ग्रह (Key Planet) होता है, उस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ।
२२. उच्च राशि का सूर्य व्यक्ति को निरंतर उन्नति की तरह अग्रसर करता रहता है।
२३. चतुर्थ भावस्थ मंगल उसकी पत्नी के स्वास्थ्य को नरम रखता है।
२४. पंचम भावस्थ गुरु शुभ फलदायक नहीं होता ।
१३. यदि किसी भाव पर राहू, शनि और मंगल की दृष्टि हो तो इस भाव का लाभ जातक को मिल ही नहीं सकता, क्योंकि ये तीनों ही विच्छेदात्मक ग्रह हैं।
१४. किसी भी स्वराशिस्य ग्रह के साथ केतु बैठा हो तो उस ग्रह के बल में विशेष वृद्धि हो जाती है।
१५. तीसरे, छठे तथा ग्यारहवें भाव के स्वामी जहां भी होंगे, उस भाव की शुभता में क्षीणता ही लायेंगे ।
१६. राहू-केतु जिस ग्रह के साथ बैठेंगे, उस ग्रह के गुणों को अपना लेंगे तथा वैसा ही फल देने लगेंगे ।
१७. सप्तमेश, अष्टमेश की अपेक्षा भी द्वितीयेश प्रवल मारक होता है।
१८. सप्तमेश, अष्टमेश, द्वितीयेश या गुरु अथवा शुक्र की दशा अन्तर्दशा में ही विवाह होने का योग बनता है।
१६. माता को छठे, आठवें, ग्यारहवें या बारहवें चन्द्र आने पर ही संतान जन्म लेती है।
२०. गोचर में जव दशम भाव में मंगल आता है, तब पतन, स्थानान्तरण या हानि होती है।
२१. जन्म कुण्डली में जो केंद्र बिंदु ग्रह (Key Planet) होता है, उस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ।
२२. उच्च राशि का सूर्य व्यक्ति को निरंतर उन्नति की तरह अग्रसर करता रहता है।
२३. चतुर्थ भावस्थ मंगल उसकी पत्नी के स्वास्थ्य को नरम रखता है।
२४. पंचम भावस्थ गुरु शुभ फलदायक नहीं होता ।
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