तहक्षी™ Tehxi
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@yajnshri

8 تغريدة 4 قراءة Aug 08, 2024
सप्तवार व्रत विधि जानिए
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॥ रविवार व्रत विधि ॥
रविवार सूर्य देवता की पूजा का वार है।
* जीवन में मान-सम्मान, सुख-समृद्धि, धन-संपत्ति, उत्तम स्वास्थ्य, कुष्ठ रोग से मुक्ति, शत्रुओं से सुरक्षा और सभी मनोकामनाओं कि पुर्ति हेतु रविवार का व्रत सर्वश्रेष्ठ है।
* सूर्य का व्रत एक वर्ष या ३० रविवारों तक अथवा १२ रविवारों तक करना चाहिए।
• रविवार को सूर्योदय से पूर्व बिस्तर से उठकर शौच व स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ लाल रंग के वस्त्र पहनें। तत्पश्चात घर के किसी पवित्र स्थान पर भगवान सूर्य की स्वर्ण निर्मित मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद विधि-विधान से गंध-पुष्पादि से भगवान सूर्य का पूजन करें। पूजन के बाद व्रतकथा सुनें एवं आरती करें। तत्पश्चात सूर्य भगवान का स्मरण करते हुए 'ॐ हां हीं हौं सः सूर्याय नमः' इस मंत्र का १२ या ५ अथवा ३ माला जप करें। जप के बाद शुद्ध जल, रक्त चंदन, अक्षत, लाल पुष्प और दूर्वा से सूर्य को अर्घ्य दें। एक समय भोजन करें। सूर्य अस्त होने के बाद भोजन नहीं करना चाहिए सात्विक भोजन व फलाहार करें। भोजन में गेहूं की रोटी, दलिया, दूध, दही, घी और चीनी खाएं।
• रविवार के दिन नमक नहीं खाएं। इस दिन उपासक को तेल से निर्मित नमकीन खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।यदि किसी कारणवश सूर्य अस्त हो जाए और व्रत करने वाला भोजन न कर पाए तो अगले दिन सूर्योदय तक वह निराहार रहे तथा फिर स्नानादि से निवृत्त होकर, सूर्य भगवान को जल देकर, उनका स्मरण करने के बाद ही भोजन ग्रहण करे।
॥ सोमवार व्रत विधि ॥ •
सोमवार का व्रत साधारणतया दिन के तीसरे पहर तक होता है। व्रत में फलाहार या पारण का कोई खास नियम नहीं है किन्तु यह आवश्यक है कि दिन रात में केवल एक समय भोजन करें। सोमवार के व्रत में शिवजी पार्वती का पूजन करना चाहिए।
सोमवार के व्रत तीन प्रकार के हैं साधारण प्रति सोमवार, सौम्य प्रदोष और सोलह सोमवार विधि तीनों की एक जैसी है।
अधा सेर गेहूं का आटा के तीन अंगा बनाकर घी, गुड़, दीप, नैवेद्य, पूंगीफ़ल, बेलपत्र, जनेउ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प, आदि से प्रदोष काल में शंकर जी का पूजन करें। प्रसाद का एक अंग शिवजी को अर्पण करें। दो अंगाओं को प्रसाद स्वरूप बांटें और स्वयं भी ग्रहण करें।
शिव पूजन के पश्चात् कथा सुननी चाहिए। प्रदोष व्रत सोलह सोमवार कथा तीनों की अलग -अलग हैं जो लिखी गई हैं।
• सत्रहवें सोमवार के दिन पाव भर गेहूं के आटे की बाटी बनाकर, घी और गुड़ बनाकर चूरमा बनायें, भोग लगाकर उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें।
॥ मंगलवार व्रत विधि ॥
सर्व सुख, रक्त विकार, राज्य, सम्मान तथा पुत्र प्राप्ति हेतु २१ मंगलवार का व्रत करना उत्तम है।
इस व्रत में गेहूं और गुड़ का ही भोजन करना चाहिये।
भोजन दिन रात में एक ही बार ग्रहण करना चाहिए। नमक नहीं खाना है।
लाल पुष्प चढ़ायें और लाल ही वस्त्र धारण करें।
हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए तथा मंगलवार की कथा सुननी चाहिए।
बुधवार व्रत विधि
बुधवार का नियमित व्रत करने से अरिष्ट ग्रहों की शांति एवं सर्व-सुखों की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने से बुद्धि बढ़ती है।
• जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं रहता। बुधवार व्रत के दिन भगवान को सफेद फूल तथा हरे रंग की वस्तुएँ चढ़ाएँ। इस व्रत में रात दिन में एक ही बार भोजन करना चाहिए।
इस दिन प्रातः उठकर संपूर्ण घर की सफाई करें। तत्पश्चात स्नानादि से निवृत्त हो जाएँ। इसके बाद पवित्र जल का घर में छिड़काव करें। घर के ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान बुध या शंकर भगवान की मूर्ति अथवा चित्र किसी कांस्य पात्र में स्थापित करें। तत्पश्चात धूप, बेल-पत्र, अक्षत और घी का दीपक जलाकर पूजा करें।
इसके बाद निम्न मंत्र से बुध की प्रार्थना करें-बुध त्वं बुद्धिजनको बोधदः सर्वदा नृणाम् ।
तत्वावबोधं कुरुषे सोमपुत्र नमो नमः ॥
बुधवार की व्रतकथा सुनकर आरती करें। इसके पश्चात गुड़, भात और दही का प्रसाद बाँटकर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें।
यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दान दें। किसी भी रूप में व्रतकथा को बीच में छोड़कर, प्रसाद ग्रहण किए बिना कहीं नहीं जाना चाहिए।
• बृहस्पतिवार व्रत विधि
किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र और गुरुवार के योग के दिन इस व्रत की शुरुआत करना चाहिए।
नियमित सात व्रत करने से गुरु ग्रह से उत्पन्न अनिष्ट नष्ट होता है, धन विद्या का लाभ होता है।
भोजन दिन रात में एक ही बार नमक रहित करना चाहिए। वह भी चने की दाल का होना चाहिए।
सूर्योदय से पहले उठकर स्नान से निवृत्त होकर पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए । शुद्ध जल छिड़ककर पूरा घर पवित्र करें। घर के ही किसी पवित्र स्थान पर बृहस्पतिवार की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। तत्पश्चात पीत वर्ण के गन्ध-पुष्प और अक्षत से विधि-विधान से पूजन करें।
• इसके बाद निम्न मंत्र से प्रार्थना करें।
धर्मशास्तार्थतत्वज्ञ ज्ञानविज्ञानपारग । विविधार्तिहराचिन्त्य देवाचार्य नमोऽस्तु ते ॥
तत्पश्चात आरती कर व्रत कथा सुनें।
• बृहस्पतिवार के व्रत में कन्दली फल (केले) के वृक्ष की पूजा की जाती है।
• शुक्रवार व्रत विधि
* धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां संतोषी के पिता भगवान गणेश और माता रिद्धि-सिद्धि हैं। धन, विवाह, संतानादि, राज्य, सम्मान, भौतिक सुखों में वृद्धि, रक्त विकार दुर, हेतु यह व्रत शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार से प्रारम्भ कर १६ शुक्रवार तक व्रत किए जाने का विधान है।
• सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफ़ाई इत्यादि पूर्ण कर लें।
• स्नानादि के पश्चात घर में किसी सुन्दर व पवित्र जगह पर माता संतोषी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। संतोषी माता के संमुख एक कलश जल भर कर रखें. कलश के ऊपर एक कटोरा भर कर गुड़ व चना रखें।
• माता के समक्ष एक घी का दीपक जलाएं। माता को अक्षत, फूल, सुगन्धित गंघ, नारियल, लाल वस्र या चुनरी अर्पित करें।
• माता संतोषी को गुड़ व चने का भोग लगाएँ। संतोषी माता की जय बोलकर माता की कथा आरम्भ करें। इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ में गुड़ और भुने हुए चने रखे।
• कथा समाप्त होने पर हाथ का गुड और चना गाय को खिला देवें।
• कलश के ऊपर रखा गुड और चना सभी को प्रसाद के रूप में बांट देवें।
• कथा समाप्त होने और आरती होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगहों पर छिड़कें और बचा हुवा जल तुलसी की क्यारी में सींच देवें। -व्रत करने वाले को श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न मन से व्रत करना चाहिए, इस दिन व्रत करने वाले स्त्री-पुरुष को ना ही खट्टी चीजें हाथ लगानी चाहिए और ना ही खानी चाहिए।
शनिवार व्रत विधि
• शनि की दशा को दूर करने के लिए यह व्रत किया जाता है।
• शनि व्रत अग्नि पुराण के अनुसार शनि ग्रह की मुक्ति के लिए "मूल' नक्षत्र युक्त शनिवार से आरंभ करके सात शनिवार शनिदेव की व्रत एवं पूजा की जाती है। व्रत रखने के लिए सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठे और स्नान करें।
• इसके बाद पीपल के वृक्ष पर जल अर्पण करना चाहिए। • शनि देवता की लोहे की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए। शनिदेव की प्रतिमा को चावलों से बनाए चौबीस दल के कमल पर स्थापित करें।
• शनिदेव की पूजा में काले तिल, काला वर, काला उडद, और तेल सम्मिलित करें।
• शनिदेव के १० नामों का उच्चारण अवश्य करें। वे नाम इस तरह है- कोणस्थ, कृष्ण, पिप्पला, सौरि, यम, पिंगलो, रोट्रोतको, बभ्रु, बंद, शनैश्वर ।
• शनिदेव के पूजन के पश्चात् पीपल के वृक्ष के तने पर सूत के धागे से ७ बार परिक्रमा करें।

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