पृथ्वी तत्व, आकाश तत्व, जल तत्व में आश्चर्य जनक शक्ति
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🔺पृथ्वी की आश्चर्यजनक शक्ति-
(१) नंगे पांव चलकर पृथ्वी तल से सीधा स्पर्श होता है। नंगे पांवों चलने वाला पांवों को दृढ़ करता है और पृथ्वी से प्राणशक्ति खींचता है। नंगे पांवों चलने से रुधिराभिसरण बराबर होता है।
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🔺पृथ्वी की आश्चर्यजनक शक्ति-
(१) नंगे पांव चलकर पृथ्वी तल से सीधा स्पर्श होता है। नंगे पांवों चलने वाला पांवों को दृढ़ करता है और पृथ्वी से प्राणशक्ति खींचता है। नंगे पांवों चलने से रुधिराभिसरण बराबर होता है।
कमरे के फर्श, पत्थरों या हरी घास पर नंगे पाँव चलने से शक्ति प्राप्त होती है। जमीन पर सोने से जो सुख शान्ति मिलती है, वृक्षों तथा घर की शय्या पर वैसी दुर्लभ है। रात्रि में पृथ्वी पर सोने से निद्रा और शरीर में शान्ति होने के कारण पृथ्वी का बलदायक प्रभाव सूर्य स्नान या नंगे बदन सोने की अपेक्षा अधिक चमत्कारिक होता है।
कोई भी योगी तथा क्रिया योगी ईश्वर की ऐसी अनुभूतियों से स्वतः ही जुड़े होते है तभी कोई रोग उनके ध्यान तथा ज्ञान में कभी अड़चन नही बनता
(२) कई रोगों में पृथ्वी पर सोने से चमत्कारपूर्ण लाभ होता है। सोने के लिए ऐसी भूमि पसन्द करनी चाहिए, जहाँ घास कम उगी हुई हो। स्वाभाविक जीवन प्रारम्भ करने वालों को कुछ दिन हवादार पर्णकुटी में सोना चाहिए। आनन्दी और फुर्तीला रहने के लिए यथासम्भव प्रकृति का अनुसरण करना चाहिए। प्रकृति में पशु कम सोते हैं; किन्तु गहरी निद्रा लेते हैं। हमें भी यथा शक्य आराम के लिए, नवजीवन संचार के लिए विश्राम करना चाहिए, थोड़ी और आवश्यक नींद लेने से दृढ़ता, दीर्घायु एवं नवजीवन आता है। अधिक नींद से आलस्य बढ़ता है आयु और समय का नाश होता है। कृत्रिम शिथिलता अधिक निद्रा का परिणाम है।
कोई भी योगी तथा क्रिया योगी ईश्वर की ऐसी अनुभूतियों से स्वतः ही जुड़े होते है तभी कोई रोग उनके ध्यान तथा ज्ञान में कभी अड़चन नही बनता
(२) कई रोगों में पृथ्वी पर सोने से चमत्कारपूर्ण लाभ होता है। सोने के लिए ऐसी भूमि पसन्द करनी चाहिए, जहाँ घास कम उगी हुई हो। स्वाभाविक जीवन प्रारम्भ करने वालों को कुछ दिन हवादार पर्णकुटी में सोना चाहिए। आनन्दी और फुर्तीला रहने के लिए यथासम्भव प्रकृति का अनुसरण करना चाहिए। प्रकृति में पशु कम सोते हैं; किन्तु गहरी निद्रा लेते हैं। हमें भी यथा शक्य आराम के लिए, नवजीवन संचार के लिए विश्राम करना चाहिए, थोड़ी और आवश्यक नींद लेने से दृढ़ता, दीर्घायु एवं नवजीवन आता है। अधिक नींद से आलस्य बढ़ता है आयु और समय का नाश होता है। कृत्रिम शिथिलता अधिक निद्रा का परिणाम है।
पृथ्वी का कोई जानवर मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करता। मनुष्य ही इन मादक पदार्थों का विष सेवन करता और प्रकृति के द्वारा सजा पाता है। पृथ्वी पर अधिक से अधिक बैठिये, सोइये, चलिये, विश्राम कीजिये। रात्रि के समय पृथ्वी की शक्ति अति प्रबल होती है इसलिए योगी रात्रि समय अधिक ध्यान में रहते थे
आकाश तत्व- खुले आकाश के नीचे सोना श्रेयस्कर है, योंकि आकाश में अद्भुत शक्ति है। आकाश तत्व को ग्रहण करने के लिए मैदान में अधिक से अधिक समय व्यतीत करना चाहिए।अधिक योगी जन खुले आकाश के नीचे जप तप ध्यान किया करते थे
आकाश तत्व- खुले आकाश के नीचे सोना श्रेयस्कर है, योंकि आकाश में अद्भुत शक्ति है। आकाश तत्व को ग्रहण करने के लिए मैदान में अधिक से अधिक समय व्यतीत करना चाहिए।अधिक योगी जन खुले आकाश के नीचे जप तप ध्यान किया करते थे
जल तत्व- ईश्वर प्रदत्त सर्वोत्तम पेय पदार्थ स्वच्छ, निर्मल, शीतल, (बिना स्वाद का) जल है, प्राणियों का जीवन धारण जल पर निर्भर है। वायु के पश्चात् यही प्रमुख तत्व है। जल-प्राणियों का प्राण है। सम्पूर्ण संसार ही जलमय है। जल सर्वप्रधान औषधि है। इसके सेवन से जीवन सुखमय बनता है और शरीर की अग्नि भी आरोग्यवर्द्धक होती है। जल शरीर के लिए एक सर्वांगपूर्ण शक्ति है। यह रक्त, स्रायु, मांसपेशी तथा प्रत्येक कोष को सतेज और सशक्त करता है। शरीर की समस्त प्रणाली जैसे- भोजन, श्वास, रक्त संचालन के लिए अनिवार्य है। यह मन को शान्ति, स्फूर्ति और प्रफुल्लता प्रदान करता है।
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