चमत्कारी योग मुद्रायें एवं क्रियायें और मृतसंजीवनी मुद्रा क्यूँ संजीवनी है
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मानव शरीर प्रकृति की सर्वोतम कृति है। प्रकृति ने मानव शरीर को अपने में पूर्ण बनाया है। हाथ की पांचों अंगुलियां ही पंच तत्व हैं।
पहली अंगुली वायु,
मध्यमा आकाश,
अनामिका पृथ्वी,
कनिष्ठिका सबसे छोटी अंगुली जल मानी गई है।
💫 मुद्रायें ऋषियों के गहन अध्ययन और अणवेषण का रहस्य हैं।
• मुद्राएं इंजेक्शन की भांति तीव्र गति से प्रभावकारी सिद्ध हुई हैं। योग मुद्राएं मानव जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाने मे पूर्णरूपेण समर्थ हैं।
• सूक्ष्म मानव शरीर की अन्तरतम प्रकृति में उतार-चढ़ाव उपस्थित कर सकती हैं।
किसी भी कारण से समाप्त हुई प्राण शक्ति को पुनः प्राप्ति के निर्मित प्राण मुद्रा करें।
• शब्द शक्ति वाक शक्ति को बढ़ाने के लिए शंख मुद्रा अद्भुत क्षमता रखती है।
• वायु मुद्रा के द्वारा वायु से होने वाले रोगों का शीघ्र से शीघ्र बिना औषध उपचार सम्भव ।
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मानव शरीर प्रकृति की सर्वोतम कृति है। प्रकृति ने मानव शरीर को अपने में पूर्ण बनाया है। हाथ की पांचों अंगुलियां ही पंच तत्व हैं।
पहली अंगुली वायु,
मध्यमा आकाश,
अनामिका पृथ्वी,
कनिष्ठिका सबसे छोटी अंगुली जल मानी गई है।
💫 मुद्रायें ऋषियों के गहन अध्ययन और अणवेषण का रहस्य हैं।
• मुद्राएं इंजेक्शन की भांति तीव्र गति से प्रभावकारी सिद्ध हुई हैं। योग मुद्राएं मानव जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाने मे पूर्णरूपेण समर्थ हैं।
• सूक्ष्म मानव शरीर की अन्तरतम प्रकृति में उतार-चढ़ाव उपस्थित कर सकती हैं।
किसी भी कारण से समाप्त हुई प्राण शक्ति को पुनः प्राप्ति के निर्मित प्राण मुद्रा करें।
• शब्द शक्ति वाक शक्ति को बढ़ाने के लिए शंख मुद्रा अद्भुत क्षमता रखती है।
• वायु मुद्रा के द्वारा वायु से होने वाले रोगों का शीघ्र से शीघ्र बिना औषध उपचार सम्भव ।
आबाल वृद्ध स्त्री-पुरुषों के मानसिक विकास में ज्ञान मुद्रा चमत्कारिक प्रभाव उत्पन्न करती है।
• ऐसे ही चमत्कारी शुन्य मुद्रा द्वारा कान के दर्द का तत्काल आराम।
• हृदय रोग के घातक आक्रमण के समय संजीवनी मुद्रा (अपान वायु मुद्रा) से आश्चर्य चकित कर देने वाला प्रभाव तुरन्त देखा जा सकता है।
सप्त चक्रासनों के सात आसनों को केवल सात मिनट नित्य करने से सम्पूर्ण रोगों का नाश।
रीढ़ चिकित्सा प्रणाली की अद्भुत खोज सप्त चक्र आसन ।
रीढ़ मेरुदण्ड के समस्त दोषों को दूर करने के लिए सप्त चक्रासन परम आवश्यक।
(संजीवनी) अपान वायु मुद्रा हृदय रोग पर रामबाण सिद्ध हुई है।
• वस्तुत ज्ञान प्राप्ति के लिए ज्ञान मुद्रा का अभ्यास ही अपने मे परिपूर्ण साधना है।
प्राण मुद्रा से नेत्रों के सम्बन्ध में विकास सम्भव।
सप्त चक्रासन सम्पूर्ण मानव शरीर को स्वास्थ्य प्रदान करने की अद्भुत तालिका हैं।
अनिद्रा की अमोध औषधि ज्ञान मुद्गा।
स्नायुमंडल सम्बन्धी सभी प्रकार की शान्तिर्थ ज्ञान मुद्रा से अधिक कोई उपचार नहीं।
• ऐसे ही चमत्कारी शुन्य मुद्रा द्वारा कान के दर्द का तत्काल आराम।
• हृदय रोग के घातक आक्रमण के समय संजीवनी मुद्रा (अपान वायु मुद्रा) से आश्चर्य चकित कर देने वाला प्रभाव तुरन्त देखा जा सकता है।
सप्त चक्रासनों के सात आसनों को केवल सात मिनट नित्य करने से सम्पूर्ण रोगों का नाश।
रीढ़ चिकित्सा प्रणाली की अद्भुत खोज सप्त चक्र आसन ।
रीढ़ मेरुदण्ड के समस्त दोषों को दूर करने के लिए सप्त चक्रासन परम आवश्यक।
(संजीवनी) अपान वायु मुद्रा हृदय रोग पर रामबाण सिद्ध हुई है।
• वस्तुत ज्ञान प्राप्ति के लिए ज्ञान मुद्रा का अभ्यास ही अपने मे परिपूर्ण साधना है।
प्राण मुद्रा से नेत्रों के सम्बन्ध में विकास सम्भव।
सप्त चक्रासन सम्पूर्ण मानव शरीर को स्वास्थ्य प्रदान करने की अद्भुत तालिका हैं।
अनिद्रा की अमोध औषधि ज्ञान मुद्गा।
स्नायुमंडल सम्बन्धी सभी प्रकार की शान्तिर्थ ज्ञान मुद्रा से अधिक कोई उपचार नहीं।
रक्तचाप को ठीक करने के लिए तर्जनी, मध्यमा और अंगुष्ठ व्यान मुद्रा के द्वारा हर व्यक्ति को भोजन करना चाहिए
इसी प्रकार किसी व्यक्ति की आँखे खड़ी जो जाएं अर्थात आँखों की घूमने की और चलने की स्थिति समाप्त हो जाए अर्थात आँखें सीधी या टेड़ी होकर स्थिर हो जाएं तो अनामिका, कनिष्ठका और अंगुष्ठ आदि तीनों अंगुलियों के रगड़ने से अर्थात प्राण मुद्रा करने से आँखें पुनः ठीक प्रकार से संचालित होने लगेगी। प्राण मुद्रा के अभ्यास के द्वारा आँखों के कई प्रकार रोग दूर किए जा सकते है। नेत्र ज्योति का विकास संभव हो जाता है।
रोग को दूर करने के लिए जिन विभिन्न मुद्राओं का प्रयोग किया जाता है वे भी रोगी अपनी सुविधा के अनुसार लेटकर बैठकर अथवा अन्य किसी भी स्थिति में सुविधा के अनुसार कर सकता है। अधिकांश मुद्राओं को 45 मिनट अवश्य करना चाहिए किन्तु रोग आदि को दूर करने के लिए जो मुद्राएं प्रयोग की जाती हैं उन्हें अधिक से अधिक किया जा सकता है। किन्तु जब रोग दूर हो जाए तब उनका प्रयोग बन्द कर दिया जाए किन्तु जो मुद्राए शरीर की शक्ति को बढ़ाती हैं व शरीर को शुद्ध करती हैं अथवा बुद्धि का विकास करती हैं व स्नायुमंडल को शक्तिशाली बनाती हैं, उनका प्रयोग अपनी इच्छा अनुसार रोगी व साधक कर सकता है। रोग दूर करने वाली मुद्राओं को रोगी तब तक बार-बार कर सकता है, जब तक की रोग दूर ना हो जाए।
इसी प्रकार किसी व्यक्ति की आँखे खड़ी जो जाएं अर्थात आँखों की घूमने की और चलने की स्थिति समाप्त हो जाए अर्थात आँखें सीधी या टेड़ी होकर स्थिर हो जाएं तो अनामिका, कनिष्ठका और अंगुष्ठ आदि तीनों अंगुलियों के रगड़ने से अर्थात प्राण मुद्रा करने से आँखें पुनः ठीक प्रकार से संचालित होने लगेगी। प्राण मुद्रा के अभ्यास के द्वारा आँखों के कई प्रकार रोग दूर किए जा सकते है। नेत्र ज्योति का विकास संभव हो जाता है।
रोग को दूर करने के लिए जिन विभिन्न मुद्राओं का प्रयोग किया जाता है वे भी रोगी अपनी सुविधा के अनुसार लेटकर बैठकर अथवा अन्य किसी भी स्थिति में सुविधा के अनुसार कर सकता है। अधिकांश मुद्राओं को 45 मिनट अवश्य करना चाहिए किन्तु रोग आदि को दूर करने के लिए जो मुद्राएं प्रयोग की जाती हैं उन्हें अधिक से अधिक किया जा सकता है। किन्तु जब रोग दूर हो जाए तब उनका प्रयोग बन्द कर दिया जाए किन्तु जो मुद्राए शरीर की शक्ति को बढ़ाती हैं व शरीर को शुद्ध करती हैं अथवा बुद्धि का विकास करती हैं व स्नायुमंडल को शक्तिशाली बनाती हैं, उनका प्रयोग अपनी इच्छा अनुसार रोगी व साधक कर सकता है। रोग दूर करने वाली मुद्राओं को रोगी तब तक बार-बार कर सकता है, जब तक की रोग दूर ना हो जाए।
तत्वयोग मुद्रा विज्ञान की शक्तिशाली क्रिया
पहली तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगायें और सबसे बड़ी मध्यमा और अनामिका उंगली के अग्र भाग को अंगूठे के अग्र भाग से मिलाने पर जो आकृति बनती है उसे मृतसंजीवनी मुद्रा कहते हैं।
यह मुद्रा वायु मुद्रा और अपान मुद्रा को दोनों मुद्राओं को एक साथ करने से बन जाती है। दोनों मुद्राओं को मिलाकर बनी होने के कारण यह सभी साधारण मुद्राओं की अपेक्षा बहुत ही तीव्र गीत से अपना प्रभाव प्रदर्शित करती है।
अपान वायु
इन हृदय रोग के अशुभ लक्षर्णा को दूर करने के लिए यदि मृतसंजीवनी मुद्रा तत्काल की जाए तो कुछ ही क्षण में अर्थात दो-तीन सेकेंड में ही हृदय पर अनुकूल प्रभाव (फर्स्ट एड) प्राथमिक चिकित्सा के रूप में पूरी सहायता मिलती है। अर्थात सोरबिटेट औषधि की तरह मृतसंजीवनी मुद्रा अपना प्रभाव स्पष्ट दिखा देती है और रोगी को चमत्कारिक राहत (सहायता) मिल जाती है। यह मुद्रा योग विज्ञान की सर्वाधिक चमत्कारी प्रक्रिया हृदय रोग के लिए सिद्ध हुई हैं। अब तक अनगिनत लोगों ने इसका प्रयोग करके, इसका जोरदार शामक प्रभाव, हृदय रोग के लिए अनुभव किया। हृदय रोगी पर यह मुद्रा तत्काल, आपातकाल के समय रामबाण की अपना अचूक प्रभाव निश्चित दिखाती है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं। हृदय रोग के आक्रमण के बाद भी नियमित रूप से, वह रोगी इस प्राणादायिनी है
मुद्रा के थोड़े रूप में निरन्तर अभ्यास करता रहे तो धीरे-धीरे हृदय शक्तिशाली हो जायेगा। नदि इसके साथ प्राकृतिक उपचार, भोजन आदि की ठीक व्यवस्था, आवश्यक सूक्ष्म, सरल यौगिक व्यायाम और पराध्यान साधना का त्रिकाल नियमित रूप से अभ्यास किया जाए तो हृदय रोगी में बहुत ही कम समय में आशा से अधिक चमत्कारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगेगा। यह मृतसंजीवनी मुद्रा यथा नाम तथा गुण वाली उक्ति पर पूर्ण उतरती है।
मृतसंजीवनी शब्द के द्वारा ही यह स्पष्ट होता है कि यह जीवनदायिनी है। हृदयरोग विभिन्न प्रकार का होता है। यदि अन्य आवश्यक सरल योगासन, प्रातः भ्रमण, प्राकृतिक आहार, साधरण जीवन में संयम, क्रोध आदि दुर्गुणों का त्याग, अल्पहार और सम्यक् ध्यान साधना, इन सभी उपचारों के साथ इन मुद्रा के अभ्यास को करने से रोगी में निश्चय आश्चर्यचकित कर देने वाले लक्षण बहुत थोड़े समय में ही दृष्टिगोचर होने लगेंगे।
पहली तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगायें और सबसे बड़ी मध्यमा और अनामिका उंगली के अग्र भाग को अंगूठे के अग्र भाग से मिलाने पर जो आकृति बनती है उसे मृतसंजीवनी मुद्रा कहते हैं।
यह मुद्रा वायु मुद्रा और अपान मुद्रा को दोनों मुद्राओं को एक साथ करने से बन जाती है। दोनों मुद्राओं को मिलाकर बनी होने के कारण यह सभी साधारण मुद्राओं की अपेक्षा बहुत ही तीव्र गीत से अपना प्रभाव प्रदर्शित करती है।
अपान वायु
इन हृदय रोग के अशुभ लक्षर्णा को दूर करने के लिए यदि मृतसंजीवनी मुद्रा तत्काल की जाए तो कुछ ही क्षण में अर्थात दो-तीन सेकेंड में ही हृदय पर अनुकूल प्रभाव (फर्स्ट एड) प्राथमिक चिकित्सा के रूप में पूरी सहायता मिलती है। अर्थात सोरबिटेट औषधि की तरह मृतसंजीवनी मुद्रा अपना प्रभाव स्पष्ट दिखा देती है और रोगी को चमत्कारिक राहत (सहायता) मिल जाती है। यह मुद्रा योग विज्ञान की सर्वाधिक चमत्कारी प्रक्रिया हृदय रोग के लिए सिद्ध हुई हैं। अब तक अनगिनत लोगों ने इसका प्रयोग करके, इसका जोरदार शामक प्रभाव, हृदय रोग के लिए अनुभव किया। हृदय रोगी पर यह मुद्रा तत्काल, आपातकाल के समय रामबाण की अपना अचूक प्रभाव निश्चित दिखाती है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं। हृदय रोग के आक्रमण के बाद भी नियमित रूप से, वह रोगी इस प्राणादायिनी है
मुद्रा के थोड़े रूप में निरन्तर अभ्यास करता रहे तो धीरे-धीरे हृदय शक्तिशाली हो जायेगा। नदि इसके साथ प्राकृतिक उपचार, भोजन आदि की ठीक व्यवस्था, आवश्यक सूक्ष्म, सरल यौगिक व्यायाम और पराध्यान साधना का त्रिकाल नियमित रूप से अभ्यास किया जाए तो हृदय रोगी में बहुत ही कम समय में आशा से अधिक चमत्कारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगेगा। यह मृतसंजीवनी मुद्रा यथा नाम तथा गुण वाली उक्ति पर पूर्ण उतरती है।
मृतसंजीवनी शब्द के द्वारा ही यह स्पष्ट होता है कि यह जीवनदायिनी है। हृदयरोग विभिन्न प्रकार का होता है। यदि अन्य आवश्यक सरल योगासन, प्रातः भ्रमण, प्राकृतिक आहार, साधरण जीवन में संयम, क्रोध आदि दुर्गुणों का त्याग, अल्पहार और सम्यक् ध्यान साधना, इन सभी उपचारों के साथ इन मुद्रा के अभ्यास को करने से रोगी में निश्चय आश्चर्यचकित कर देने वाले लक्षण बहुत थोड़े समय में ही दृष्टिगोचर होने लगेंगे।
हृदय रोग के विभिन्न प्रकार के उपद्रवों में overline 45 किसी न किसी प्रकार अपना प्रभाव अच्छे रूप में दिखाती है। हृदय रोगियों के लिए इसका प्रयोग सभी अवस्थाओं को सहयोगी सिद्ध होगा।
1. इससे हृदय को बल मिलता है।
2. हृदय के कई विकार दूर होते हैं।
3. रक्तचाप व्यवस्थित करने के लिए थोड़ी सी सहायता मिलती है।
4. रोगी का मनोबल भी बढ़ता है और इसका दूरगामी प्रभाव अच्छा होता है।
ज्योतिष विज्ञान के अनुसार जब शनि, राहु ग्रह आदि का अधिक अशुभ काल चल रहा हो और उसके कारण हृदय पर बुरा प्रभाव हो रहा हो तो मृतसंजीवनी मुद्रा करने से उसका उपाय हो जाता अर्थात मृतसंजीवनी मुद्रा के करने से और वह भी वज्रासन में बैठकर किए जाने पर यह मुद्रा अपना और अधिक प्रभाव उपस्थित करती है।
1. इससे हृदय को बल मिलता है।
2. हृदय के कई विकार दूर होते हैं।
3. रक्तचाप व्यवस्थित करने के लिए थोड़ी सी सहायता मिलती है।
4. रोगी का मनोबल भी बढ़ता है और इसका दूरगामी प्रभाव अच्छा होता है।
ज्योतिष विज्ञान के अनुसार जब शनि, राहु ग्रह आदि का अधिक अशुभ काल चल रहा हो और उसके कारण हृदय पर बुरा प्रभाव हो रहा हो तो मृतसंजीवनी मुद्रा करने से उसका उपाय हो जाता अर्थात मृतसंजीवनी मुद्रा के करने से और वह भी वज्रासन में बैठकर किए जाने पर यह मुद्रा अपना और अधिक प्रभाव उपस्थित करती है।
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