वाल्मीकि रचित रामायण और तुलसीदास रचित रामायण में किन किन प्रसंगो में अंतर है?
वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में बहुत सारे अन्तर हैं जिन्हें दोनों ग्रन्थ पढ़ने पर सरलता से देखा जा सकता है।
सर्वप्रथम दोनों ग्रन्थों को लिखने की भावना में ही बहुत अन्तर है। ऋषि वाल्मीकि ने जहाँ मूलकथा को एक अवतार के रूप में बताने का प्रयत्न किया है, वहीं तुलसीदास ने श्रीराम की भक्ति में ग्रन्थ लिखा है। वाल्मीकि के राम देवताओं के हित के लिए विष्णु के अवतार हैं परन्तु तुलसीदास के राम स्वयं सर्वशक्तिशाली, अनादि, अनन्त ईश्वर हैं। स्वयंभुव मनु-शतरूपा तपस्या से राम को प्रसन्न कर उन्हें पुत्र रूप में पाने का वरदान माँगते हैं। यहाँ कहीं-कहीं सीता को लक्ष्मी से भी महान दर्शाया गया है। दूसरा अन्तर जो सभी जानते हैं, वह भाषा का है। रामायण कई शताब्दियों तक संस्कृत में पढ़ी-सुनी जाती रही, उसका अनुवाद दक्षिण भारत की अन्य भाषाओं में तो हुआ था परन्तु उत्तर भारत में नहीं। ऐसे में जब सम्पूर्ण भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार हो रहा था, धर्मांतरण का बोलबाला था, तुलसीदास ने श्रीराम के सुराज्य के अर्थ को समझाने हेतु रामकथा को जनमानस की भाषा में बताने का बीड़ा उठाया। उन्होंने इसके लिए अवधी भाषा को चुना। वह अयोध्या में रहते थे और उन्होंने अयोध्या में ही इस ग्रन्थ को रामनवमी के दिन लिखना प्रारम्भ किया। रामायण (उत्तरकाण्ड) के अनुसार वाल्मीकि प्रचेता के दसवें पुत्र थे जो धर्मात्मा थे परन्तु तुलसीदास उन्हें मूढ़ (राम को मरा-मरा कहने वाले) बताते हैं। कदाचित वाल्मीकि एक से अधिक रहे हों। पहले वाल्मीकि रामायण के रचयिता और बाद में उन्हीं की परम्परा निभाने वाले अन्य। उन्हीं अन्य वाल्मीकियों में रत्नाकर डाकू रहा होगा जिसे तुलसीदास ने प्रथम वाल्मीकि समझा हो। तुलसीदास ने अपने ग्रन्थ में कई विरोधाभास दिखाए हैं। उदाहरणार्थ, बालकाण्ड में सती-शिव को सीताहरण के समय दिखाया गया है जबकि सती सतयुग में ही दक्षयज्ञ में भस्म हो चुकीं थीं। बाद में शिव-पार्वती के विवाह में उन्हें गणेश की पूजा करते हुए बताया गया है। सीता विवाह से पूर्व पार्वती की पूजा करतीं हैं और उन्हें कार्तिकेय व गणेश की माता कह कर उनकी स्तुति करतीं हैं। राम-सीता विवाह में भी पार्वती के सम्मिलित होने का कई बार वर्णन है। रामचरितमानस में दशरथ-कौशल्या को कश्यप-अदिति एवं मनु-शतरूपा का अवतार बताया गया है जबकि रामायण में नहीं। रामायण में दशरथ की 350 स्त्रियाँ हैं जिनमें तीन मुख्य हैं। राजा की प्रत्येक वर्ण (क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) से रानी होती थी। इस प्रकार राजा प्रजा का पिता होता था। रामचरितमानस में केवल तीन रानियों का वर्णन है।
वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में बहुत सारे अन्तर हैं जिन्हें दोनों ग्रन्थ पढ़ने पर सरलता से देखा जा सकता है।
सर्वप्रथम दोनों ग्रन्थों को लिखने की भावना में ही बहुत अन्तर है। ऋषि वाल्मीकि ने जहाँ मूलकथा को एक अवतार के रूप में बताने का प्रयत्न किया है, वहीं तुलसीदास ने श्रीराम की भक्ति में ग्रन्थ लिखा है। वाल्मीकि के राम देवताओं के हित के लिए विष्णु के अवतार हैं परन्तु तुलसीदास के राम स्वयं सर्वशक्तिशाली, अनादि, अनन्त ईश्वर हैं। स्वयंभुव मनु-शतरूपा तपस्या से राम को प्रसन्न कर उन्हें पुत्र रूप में पाने का वरदान माँगते हैं। यहाँ कहीं-कहीं सीता को लक्ष्मी से भी महान दर्शाया गया है। दूसरा अन्तर जो सभी जानते हैं, वह भाषा का है। रामायण कई शताब्दियों तक संस्कृत में पढ़ी-सुनी जाती रही, उसका अनुवाद दक्षिण भारत की अन्य भाषाओं में तो हुआ था परन्तु उत्तर भारत में नहीं। ऐसे में जब सम्पूर्ण भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार हो रहा था, धर्मांतरण का बोलबाला था, तुलसीदास ने श्रीराम के सुराज्य के अर्थ को समझाने हेतु रामकथा को जनमानस की भाषा में बताने का बीड़ा उठाया। उन्होंने इसके लिए अवधी भाषा को चुना। वह अयोध्या में रहते थे और उन्होंने अयोध्या में ही इस ग्रन्थ को रामनवमी के दिन लिखना प्रारम्भ किया। रामायण (उत्तरकाण्ड) के अनुसार वाल्मीकि प्रचेता के दसवें पुत्र थे जो धर्मात्मा थे परन्तु तुलसीदास उन्हें मूढ़ (राम को मरा-मरा कहने वाले) बताते हैं। कदाचित वाल्मीकि एक से अधिक रहे हों। पहले वाल्मीकि रामायण के रचयिता और बाद में उन्हीं की परम्परा निभाने वाले अन्य। उन्हीं अन्य वाल्मीकियों में रत्नाकर डाकू रहा होगा जिसे तुलसीदास ने प्रथम वाल्मीकि समझा हो। तुलसीदास ने अपने ग्रन्थ में कई विरोधाभास दिखाए हैं। उदाहरणार्थ, बालकाण्ड में सती-शिव को सीताहरण के समय दिखाया गया है जबकि सती सतयुग में ही दक्षयज्ञ में भस्म हो चुकीं थीं। बाद में शिव-पार्वती के विवाह में उन्हें गणेश की पूजा करते हुए बताया गया है। सीता विवाह से पूर्व पार्वती की पूजा करतीं हैं और उन्हें कार्तिकेय व गणेश की माता कह कर उनकी स्तुति करतीं हैं। राम-सीता विवाह में भी पार्वती के सम्मिलित होने का कई बार वर्णन है। रामचरितमानस में दशरथ-कौशल्या को कश्यप-अदिति एवं मनु-शतरूपा का अवतार बताया गया है जबकि रामायण में नहीं। रामायण में दशरथ की 350 स्त्रियाँ हैं जिनमें तीन मुख्य हैं। राजा की प्रत्येक वर्ण (क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) से रानी होती थी। इस प्रकार राजा प्रजा का पिता होता था। रामचरितमानस में केवल तीन रानियों का वर्णन है।
रामायण में अहिल्या को अदृश्य होकर रहने का श्राप दिया जाता है जिनका उद्धार राम के दर्शन से होता है और राम-लक्ष्मण उनके पाँव छूते हैं जबकि रामचरितमानस में अहिल्या को पत्थर की देह धारण करने का श्राप मिलता है एवं राम की चरणधूल से उनका उद्धार होता है।
रामायण में राम सीता के स्वयंवर में नहीं जाते हैं, वह जनक के यज्ञ में शिवधनुष देखने मिथिला जाते हैं और उसकी कथा सुनकर उसे उठा कर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं, जिससे धनुष टूट गया। पूर्वकाल में कई योद्धा शिवधनुष उठाने में असफल हो चुके थे। रामचरितमानस में सीता के स्वयंवर में रावण एवं बाणासुर के धनुष को छूए बिना भाग जाने और राम द्वारा धनुर्भंग का वर्णन है। पुष्पवाटिका में राम-सीता के एक दूसरे को देखने का भी वर्णन है।
रामभक्ति में तुलसीदास ने अन्य चरित्रों में दोष लगा दिये हैं। लक्ष्मण को बहुत अधिक क्रोधी दिखाया है जो स्वयंवर के समय जनक पर क्रोध दिखाते हैं और धनुर्भंग के बाद परशुराम से परिहास करते हैं। सेतुबंध से पहले भी लक्ष्मण समुद्र पर क्रोध करते हैं। रामायण में जनक एवं परशुराम से लक्ष्मण की कोई वार्ता नहीं होती है। समुद्र पर भी राम ने स्वयं क्रोध करके बाण छोड़ दिया था, लक्ष्मण ने ही दूसरा बाण छोड़ने से राम को रोका था। रामायण में लक्ष्मण को दो बार क्रोध करते हुए दर्शाया गया है - पहला राम के वनवास की सूचना पर और दूसरा भरत के चित्रकूट आगमन पर।
इसी प्रकार देवताओं और विशेषतः इन्द्र को तुलसीदास ने बहुत ही अशोभनीय शब्द कह दिए हैं जबकि रामायण में उनकी महिमा कई बार बताई गई है। कई महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के मरने के बाद इन्द्रलोक प्राप्त करने का वर्णन है जैसे - श्रवणकुमार, शरभंग ऋषि, दशरथ आदि। सीता को अशोकवाटिका में इन्द्र दिव्य खीर खिलाने जाते हैं जिससे सीता को कई वर्षों तक भूख न लगे। हनुमान को इन्द्र ने इच्छामृत्यु का वरदान दिया था।
रामायण में परशुराम जी धनुर्भंग के तुरन्त बाद नहीं आते हैं, वह बारात अयोध्या वापस लौटते समय रास्ते में मिलते हैं और दशरथ तथा राम से बात करते हैं। राम क्रुद्ध होकर उनसे वैष्णव धनुष लेकर उनके पुण्य नष्ट कर देते हैं जबकि रामचरितमानस में परशुराम स्वयंवरसभा में ही पहुँच जाते हैं और लक्ष्मण-विश्वामित्र सम्वाद होता है। राम परशुराम से विनयपूर्वक बात करते हैं और परशुराम वापस लौट जाते हैं।
रामायण में राम एवं सीता की आयु का वर्णन किया गया है जिससे पता चलता है कि विवाह के समय राम की आयु 15 वर्ष और सीता की आयु 6 वर्ष थी। उसके उपरान्त वह 12 वर्ष अयोध्या में रहे अर्थात वनवास के समय राम 27 वर्ष और सीता 18 वर्ष की थीं (यह तथ्य कुछ पाठकों को आपत्तिजनक लग सकता है परन्तु ग्रन्थ में ऐसा ही है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि आज-कल का उपलब्ध ग्रन्थ मूल ग्रन्थ नहीं है। उसमें कई क्षेपक हैं)। रामचरितमानस में पात्रों की आयु गणना नहीं मिलती है।
रामायण में राम सीता के स्वयंवर में नहीं जाते हैं, वह जनक के यज्ञ में शिवधनुष देखने मिथिला जाते हैं और उसकी कथा सुनकर उसे उठा कर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं, जिससे धनुष टूट गया। पूर्वकाल में कई योद्धा शिवधनुष उठाने में असफल हो चुके थे। रामचरितमानस में सीता के स्वयंवर में रावण एवं बाणासुर के धनुष को छूए बिना भाग जाने और राम द्वारा धनुर्भंग का वर्णन है। पुष्पवाटिका में राम-सीता के एक दूसरे को देखने का भी वर्णन है।
रामभक्ति में तुलसीदास ने अन्य चरित्रों में दोष लगा दिये हैं। लक्ष्मण को बहुत अधिक क्रोधी दिखाया है जो स्वयंवर के समय जनक पर क्रोध दिखाते हैं और धनुर्भंग के बाद परशुराम से परिहास करते हैं। सेतुबंध से पहले भी लक्ष्मण समुद्र पर क्रोध करते हैं। रामायण में जनक एवं परशुराम से लक्ष्मण की कोई वार्ता नहीं होती है। समुद्र पर भी राम ने स्वयं क्रोध करके बाण छोड़ दिया था, लक्ष्मण ने ही दूसरा बाण छोड़ने से राम को रोका था। रामायण में लक्ष्मण को दो बार क्रोध करते हुए दर्शाया गया है - पहला राम के वनवास की सूचना पर और दूसरा भरत के चित्रकूट आगमन पर।
इसी प्रकार देवताओं और विशेषतः इन्द्र को तुलसीदास ने बहुत ही अशोभनीय शब्द कह दिए हैं जबकि रामायण में उनकी महिमा कई बार बताई गई है। कई महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के मरने के बाद इन्द्रलोक प्राप्त करने का वर्णन है जैसे - श्रवणकुमार, शरभंग ऋषि, दशरथ आदि। सीता को अशोकवाटिका में इन्द्र दिव्य खीर खिलाने जाते हैं जिससे सीता को कई वर्षों तक भूख न लगे। हनुमान को इन्द्र ने इच्छामृत्यु का वरदान दिया था।
रामायण में परशुराम जी धनुर्भंग के तुरन्त बाद नहीं आते हैं, वह बारात अयोध्या वापस लौटते समय रास्ते में मिलते हैं और दशरथ तथा राम से बात करते हैं। राम क्रुद्ध होकर उनसे वैष्णव धनुष लेकर उनके पुण्य नष्ट कर देते हैं जबकि रामचरितमानस में परशुराम स्वयंवरसभा में ही पहुँच जाते हैं और लक्ष्मण-विश्वामित्र सम्वाद होता है। राम परशुराम से विनयपूर्वक बात करते हैं और परशुराम वापस लौट जाते हैं।
रामायण में राम एवं सीता की आयु का वर्णन किया गया है जिससे पता चलता है कि विवाह के समय राम की आयु 15 वर्ष और सीता की आयु 6 वर्ष थी। उसके उपरान्त वह 12 वर्ष अयोध्या में रहे अर्थात वनवास के समय राम 27 वर्ष और सीता 18 वर्ष की थीं (यह तथ्य कुछ पाठकों को आपत्तिजनक लग सकता है परन्तु ग्रन्थ में ऐसा ही है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि आज-कल का उपलब्ध ग्रन्थ मूल ग्रन्थ नहीं है। उसमें कई क्षेपक हैं)। रामचरितमानस में पात्रों की आयु गणना नहीं मिलती है।
रामायण में वसिष्ठ कैकेयी को फटकारते हुए कहते हैं कि यदि राम वन को जाएँ तो सीता को ही सिंहासन पर बिठाया जाए (स्त्री सशक्तिकरण का उदाहरण)। रामचरितमानस में यह प्रसंग नहीं है।
रामायण में केवट का कोई वर्णन नहीं हैं। रामचरितमानस में रामभक्ति में ऐसे प्रसंग जोड़े गए हैं। रामायण में निषादराज गुह भारद्वाज ऋषि के आश्रम में नहीं गए थे जबकि रामचरितमानस में वह राम के साथ ही आश्रम में जाते हैं।
रामायण में राम को भारद्वाज ऋषि चित्रकूट में रहने का सुझाव देते हैं, रामचरितमानस में वाल्मीकि यह सुझाव देते हैं।
रामचरितमानस में ऋषि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण मुनि राम से आशीर्वाद माँगते हैं (यहाँ राम-भक्ति अपने चरम पर दर्शाई गई है) जो रामायण में नहीं है।
रामायण में खर-दूषण से युद्ध में राम अपने पराक्रम से ही सभी राक्षसों का वध करते हैं और खर ने भी असाधारण रणकौशल दिखाया है जबकि रामचरितमानस में राम उन्हें मोह में डाल देते हैं और सभी राक्षस आपस में एक दूसरे को राम समझ कर लड़ मरते हैं।
रामायण में रावण को युद्धकाण्ड में अपने भाइयों व पुत्रों की मृत्यु के बाद विश्वास होता है कि राम नारायण के अवतार हैं जबकि रामचरितमानस में अरण्यकाण्ड में खर-दूषण की मृत्यु के बाद ही रावण समझ जाता है कि राम अवतार हैं।
रामायण में रावण मारीच के पास दो बार सहायता हेतु जाता है। पहली बार मारीच राम की महिमा का गुणगान करके उसे वापस भेज देता है परन्तु शूर्पणखा के कहने पर रावण दुबारा जाता है और मारीच को मायामृग बनना पड़ता है। रामचरितमानस में पहली बार में ही वह मायामृग बनने पर विवश हो जाता है।
रामायण में सीता राम से मृग को पकड़ कर लाने के लिए कहतीं हैं जिसे वह अयोध्या ले जा सकें। रामचरितमानस में सीता मृगचर्म लाने को कहतीं हैं।
रामायण में लक्ष्मण को पहले ही सन्देह हो जाता है कि मृग रूप में मायावी मारीच ही होगा परन्तु रामचरितमानस में ऐसा नहीं है।
रामायण में मारीच मरते समय सीता और लक्ष्मण दोनों को पुकारता है परन्तु रामचरितमानस में केवल लक्ष्मण को पुकारता है।
रामायण में लक्ष्मण रेखा का कोई वर्णन नहीं है परन्तु रामचरितमानस में लक्ष्मण रेखा का वर्णन लंकाकाण्ड में मंदोदरी द्वारा किया गया है।
रामचरितमानस में सीता का नहीं छायासीता का हरण होता है जबकि रामायण में ऐसा नहीं है।
रामायण में जटायु रावण का रथ तोड़ देते हैं और रावण सीता को गोद में उठा कर लंका तक उड़ कर जाता है जबकि रामचरितमानस में वह रथ में ही लंका पहुँचता है।
रामायण में कुम्भकर्ण युद्ध से पहले भी जागा था और उसने रावण को भरी सभा में सीताहरण जैसे दुष्कृत्य के लिए फटकारा था। रामचरितमानस में यह प्रसंग नहीं है।
रामायण में राम हनुमान से अपना परिचय देते हैं और दोनों में मित्रता होती है जबकि रामचरितमानस में हनुमान पहले से प्रभु श्रीराम के भक्त हैं।
रामायण में सुग्रीव राम-लक्ष्मण के क्रोध के बाद वानरों को सीताखोज हेतु भेजते हैं जबकि रामचरितमानस में वह पहले ही ऐसा कर चुके होते हैं।
रामायण में सीता की खोज के समय समुद्रतट पर अंगद के मन में विद्रोह के भाव आते हैं जिन्हें हनुमान चालाकी से दबा देते हैं। रामचरितमानस में ऐसा कुछ नहीं है।
रामचरितमानस में हनुमान की लंका जाने पर विभीषण से भेंट होती है और वही उन्हें अशोकवाटिका भेजते हैं। रामायण में हनुमान की विभीषण से कोई भेंट नहीं होती है और हनुमान पूरी लंका में सीता को कई बार ढूँढने के बाद स्वयं ही अशोकवाटिका जाते हैं।
रामायण में हनुमान सीता को अपना परिचय देकर मुद्रिका देते हैं जबकि रामचरितमानस में हनुमान मुद्रिका पेड़ से सीता के पास गिरा देते हैं और बाद में उनके समक्ष आते हैं।
रामायण में हनुमान सीता को साथ चलने को कहते हैं परन्तु वह मना कर देतीं हैं जबकि रामचरितमानस में हनुमान कहते हैं कि वह सीता को साथ ले चलते परन्तु प्रभु की ऐसी आज्ञा नहीं है।
रामायण में सीता हनुमान को चूड़ामणि पहले ही दे देतीं हैं जबकि रामचरितमानस में लंकादहन के उपरान्त चूड़ामणि देतीं हैं।
रामायण में विभीषण का अपमान होने पर वह स्वयं लंका छोड़ देते हैं परन्तु रामचरितमानस में रावण उन्हें लात मार कर निकाल देता है।
रामायण में शुक व सारण को विभीषण पकड़ते हैं एवं समुद्र पार होने के उपरान्त राम के आदेश पर छोड़ते हैं। रामचरितमानस में वानर ही उन्हें पकड़ते हैं और लक्ष्मण उन्हें अपना सन्देशपत्र देकर छोड़ देते हैं और रावण द्वारा निकाले जाने पर शुक अगस्त्य ऋषि के पास लौट कर शापमुक्त हो मुनि बन जाता है।
रामायण में समुद्र पर पत्थरों के तैरने का वर्णन नहीं है। सेतु नल की शिल्पकला से बाँधा गया था। रामचरितमानस और महाभारत में समुद्र पर पत्थर तैरने का वर्णन है।
रामचरितमानस में राम एक तीर से रावण के मुकुट और मंदोदरी के कुण्डल गिरा देते हैं जो रामायण में नहीं है।
रामचरितमानस में दूत अंगद के लंका जाने पर रावण के एक पुत्र को मारने एवं रावण के चार मुकुट फेंकने का वर्णन है जो रामायण में नहीं है।
रामायण में संजीवनी बूटी लाने का दो बार वर्णन है, सुषेण वैद्य एक वानर है और कालनेमि, हनुमान-भरत मिलाप का कोई वर्णन नहीं है जबकि रामचरितमानस में संजीवनी बूटी एक बार लाने का वर्णन है, सुषेण वैद्य लंका का राजवैद्य है और कालनेमि, हनुमान-भरत मिलाप आदि का वर्णन हैं।
रामायण में मेघनाद का शीश काट कर वध होता है जबकि रामचरितमानस में लक्ष्मण का बाण मेघनाद की छाती में लगता है।
रामायण में लक्ष्मण को रावण ने मयदानव की दी हुई शक्ति मारी परन्तु रामचरितमानस में यह शक्ति उसे ब्रह्मा ने दी थी।
रामायण में मेघनाद का यज्ञ विध्वंस लक्ष्मण करते हैं जबकि रामचरितमानस में रावण के यज्ञ का विध्वंस वानर करते हैं।
रामचरितमानस में रावण ने इन्द्र के रथ के घोड़ों व सारथी को मार कर गिरा दिया था परन्तु रामायण में ऐसा नहीं हुआ।
रामचरितमानस में रावण के हृदय में सीता का वास होने के कारण राम उसके हृदय में तीर मारने में समय लगाते हैं जबकि रामायण में ऐसा कुछ नहीं है।
रामचरितमानस में रावण की नाभि में अमृत का वास बताया गया है जो कि रामायण में नहीं है। रामचरितमानस में रावण का वध 31 बाणों द्वारा होता है जबकि रामायण में ब्रह्मा द्वारा बनाए हुए एवं अगस्त्य द्वारा दिये हुए अस्त्र (ब्रह्मास्त्र) से रावण वध हुआ था।
रामायण में युद्ध के उपरान्त इन्द्र वरदान में सभी वानरों, लंगूरों व रीछों को पुनर्जीवित (अपवादस्वरूप) कर देते हैं परन्तु रामचरितमानस में यह प्रसंग दूसरे रूप में है। यहाँ देवराज अमृतवर्षा द्वारा इन्हें पुनर्जीवित करते हैं (श्री गोपाल दास जी को यह बात याद दिलाने हेतु आभार) (यह भी ध्यान योग्य है कि अमृतपान से लोग पुनर्जीवित ही नहीं, अमर हो जाते हैं)।
रामचरितमानस में राम अयोध्यावासियों से मिलने हेतु चमत्कार से कई रूप बना कर सबसे एक साथ मिलते हैं। रामायण में ऐसे किसी चमत्कार का वर्णन नहीं है।
रामचरितमानस में तुलसीदास ने रामभक्ति में स्त्रियों के विरुद्ध भी कई बार कुछ कह दिया है जैसे वह स्वभावतः अज्ञानी, मूर्ख, अधम, माया इत्यादि हैं परन्तु रामायण में स्त्रियों को यथोचित सम्मान दिया गया है।
रामायण के विशेषज्ञ उत्तरकाण्ड को मूलकथा का भाग नहीं बल्कि क्षेपक मानते हैं। यह एक प्रकार से पूरक ग्रन्थ लगता है जो मूलकथा में छूट गए किस्सों को विस्तार देता है। इसमें कई अन्य कथाओं (जिनमें कई मूलकथा से विरोधाभासी भी हैं) के साथ ही सीता के परित्याग, कुश-लव के जन्म की कथा है। रामचरितमानस में उत्तरकाण्ड में केवल राम के राज्याभिषेक और शासन का वर्णन है और कागभुशुंडि की कथा है।
रामायण में केवट का कोई वर्णन नहीं हैं। रामचरितमानस में रामभक्ति में ऐसे प्रसंग जोड़े गए हैं। रामायण में निषादराज गुह भारद्वाज ऋषि के आश्रम में नहीं गए थे जबकि रामचरितमानस में वह राम के साथ ही आश्रम में जाते हैं।
रामायण में राम को भारद्वाज ऋषि चित्रकूट में रहने का सुझाव देते हैं, रामचरितमानस में वाल्मीकि यह सुझाव देते हैं।
रामचरितमानस में ऋषि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण मुनि राम से आशीर्वाद माँगते हैं (यहाँ राम-भक्ति अपने चरम पर दर्शाई गई है) जो रामायण में नहीं है।
रामायण में खर-दूषण से युद्ध में राम अपने पराक्रम से ही सभी राक्षसों का वध करते हैं और खर ने भी असाधारण रणकौशल दिखाया है जबकि रामचरितमानस में राम उन्हें मोह में डाल देते हैं और सभी राक्षस आपस में एक दूसरे को राम समझ कर लड़ मरते हैं।
रामायण में रावण को युद्धकाण्ड में अपने भाइयों व पुत्रों की मृत्यु के बाद विश्वास होता है कि राम नारायण के अवतार हैं जबकि रामचरितमानस में अरण्यकाण्ड में खर-दूषण की मृत्यु के बाद ही रावण समझ जाता है कि राम अवतार हैं।
रामायण में रावण मारीच के पास दो बार सहायता हेतु जाता है। पहली बार मारीच राम की महिमा का गुणगान करके उसे वापस भेज देता है परन्तु शूर्पणखा के कहने पर रावण दुबारा जाता है और मारीच को मायामृग बनना पड़ता है। रामचरितमानस में पहली बार में ही वह मायामृग बनने पर विवश हो जाता है।
रामायण में सीता राम से मृग को पकड़ कर लाने के लिए कहतीं हैं जिसे वह अयोध्या ले जा सकें। रामचरितमानस में सीता मृगचर्म लाने को कहतीं हैं।
रामायण में लक्ष्मण को पहले ही सन्देह हो जाता है कि मृग रूप में मायावी मारीच ही होगा परन्तु रामचरितमानस में ऐसा नहीं है।
रामायण में मारीच मरते समय सीता और लक्ष्मण दोनों को पुकारता है परन्तु रामचरितमानस में केवल लक्ष्मण को पुकारता है।
रामायण में लक्ष्मण रेखा का कोई वर्णन नहीं है परन्तु रामचरितमानस में लक्ष्मण रेखा का वर्णन लंकाकाण्ड में मंदोदरी द्वारा किया गया है।
रामचरितमानस में सीता का नहीं छायासीता का हरण होता है जबकि रामायण में ऐसा नहीं है।
रामायण में जटायु रावण का रथ तोड़ देते हैं और रावण सीता को गोद में उठा कर लंका तक उड़ कर जाता है जबकि रामचरितमानस में वह रथ में ही लंका पहुँचता है।
रामायण में कुम्भकर्ण युद्ध से पहले भी जागा था और उसने रावण को भरी सभा में सीताहरण जैसे दुष्कृत्य के लिए फटकारा था। रामचरितमानस में यह प्रसंग नहीं है।
रामायण में राम हनुमान से अपना परिचय देते हैं और दोनों में मित्रता होती है जबकि रामचरितमानस में हनुमान पहले से प्रभु श्रीराम के भक्त हैं।
रामायण में सुग्रीव राम-लक्ष्मण के क्रोध के बाद वानरों को सीताखोज हेतु भेजते हैं जबकि रामचरितमानस में वह पहले ही ऐसा कर चुके होते हैं।
रामायण में सीता की खोज के समय समुद्रतट पर अंगद के मन में विद्रोह के भाव आते हैं जिन्हें हनुमान चालाकी से दबा देते हैं। रामचरितमानस में ऐसा कुछ नहीं है।
रामचरितमानस में हनुमान की लंका जाने पर विभीषण से भेंट होती है और वही उन्हें अशोकवाटिका भेजते हैं। रामायण में हनुमान की विभीषण से कोई भेंट नहीं होती है और हनुमान पूरी लंका में सीता को कई बार ढूँढने के बाद स्वयं ही अशोकवाटिका जाते हैं।
रामायण में हनुमान सीता को अपना परिचय देकर मुद्रिका देते हैं जबकि रामचरितमानस में हनुमान मुद्रिका पेड़ से सीता के पास गिरा देते हैं और बाद में उनके समक्ष आते हैं।
रामायण में हनुमान सीता को साथ चलने को कहते हैं परन्तु वह मना कर देतीं हैं जबकि रामचरितमानस में हनुमान कहते हैं कि वह सीता को साथ ले चलते परन्तु प्रभु की ऐसी आज्ञा नहीं है।
रामायण में सीता हनुमान को चूड़ामणि पहले ही दे देतीं हैं जबकि रामचरितमानस में लंकादहन के उपरान्त चूड़ामणि देतीं हैं।
रामायण में विभीषण का अपमान होने पर वह स्वयं लंका छोड़ देते हैं परन्तु रामचरितमानस में रावण उन्हें लात मार कर निकाल देता है।
रामायण में शुक व सारण को विभीषण पकड़ते हैं एवं समुद्र पार होने के उपरान्त राम के आदेश पर छोड़ते हैं। रामचरितमानस में वानर ही उन्हें पकड़ते हैं और लक्ष्मण उन्हें अपना सन्देशपत्र देकर छोड़ देते हैं और रावण द्वारा निकाले जाने पर शुक अगस्त्य ऋषि के पास लौट कर शापमुक्त हो मुनि बन जाता है।
रामायण में समुद्र पर पत्थरों के तैरने का वर्णन नहीं है। सेतु नल की शिल्पकला से बाँधा गया था। रामचरितमानस और महाभारत में समुद्र पर पत्थर तैरने का वर्णन है।
रामचरितमानस में राम एक तीर से रावण के मुकुट और मंदोदरी के कुण्डल गिरा देते हैं जो रामायण में नहीं है।
रामचरितमानस में दूत अंगद के लंका जाने पर रावण के एक पुत्र को मारने एवं रावण के चार मुकुट फेंकने का वर्णन है जो रामायण में नहीं है।
रामायण में संजीवनी बूटी लाने का दो बार वर्णन है, सुषेण वैद्य एक वानर है और कालनेमि, हनुमान-भरत मिलाप का कोई वर्णन नहीं है जबकि रामचरितमानस में संजीवनी बूटी एक बार लाने का वर्णन है, सुषेण वैद्य लंका का राजवैद्य है और कालनेमि, हनुमान-भरत मिलाप आदि का वर्णन हैं।
रामायण में मेघनाद का शीश काट कर वध होता है जबकि रामचरितमानस में लक्ष्मण का बाण मेघनाद की छाती में लगता है।
रामायण में लक्ष्मण को रावण ने मयदानव की दी हुई शक्ति मारी परन्तु रामचरितमानस में यह शक्ति उसे ब्रह्मा ने दी थी।
रामायण में मेघनाद का यज्ञ विध्वंस लक्ष्मण करते हैं जबकि रामचरितमानस में रावण के यज्ञ का विध्वंस वानर करते हैं।
रामचरितमानस में रावण ने इन्द्र के रथ के घोड़ों व सारथी को मार कर गिरा दिया था परन्तु रामायण में ऐसा नहीं हुआ।
रामचरितमानस में रावण के हृदय में सीता का वास होने के कारण राम उसके हृदय में तीर मारने में समय लगाते हैं जबकि रामायण में ऐसा कुछ नहीं है।
रामचरितमानस में रावण की नाभि में अमृत का वास बताया गया है जो कि रामायण में नहीं है। रामचरितमानस में रावण का वध 31 बाणों द्वारा होता है जबकि रामायण में ब्रह्मा द्वारा बनाए हुए एवं अगस्त्य द्वारा दिये हुए अस्त्र (ब्रह्मास्त्र) से रावण वध हुआ था।
रामायण में युद्ध के उपरान्त इन्द्र वरदान में सभी वानरों, लंगूरों व रीछों को पुनर्जीवित (अपवादस्वरूप) कर देते हैं परन्तु रामचरितमानस में यह प्रसंग दूसरे रूप में है। यहाँ देवराज अमृतवर्षा द्वारा इन्हें पुनर्जीवित करते हैं (श्री गोपाल दास जी को यह बात याद दिलाने हेतु आभार) (यह भी ध्यान योग्य है कि अमृतपान से लोग पुनर्जीवित ही नहीं, अमर हो जाते हैं)।
रामचरितमानस में राम अयोध्यावासियों से मिलने हेतु चमत्कार से कई रूप बना कर सबसे एक साथ मिलते हैं। रामायण में ऐसे किसी चमत्कार का वर्णन नहीं है।
रामचरितमानस में तुलसीदास ने रामभक्ति में स्त्रियों के विरुद्ध भी कई बार कुछ कह दिया है जैसे वह स्वभावतः अज्ञानी, मूर्ख, अधम, माया इत्यादि हैं परन्तु रामायण में स्त्रियों को यथोचित सम्मान दिया गया है।
रामायण के विशेषज्ञ उत्तरकाण्ड को मूलकथा का भाग नहीं बल्कि क्षेपक मानते हैं। यह एक प्रकार से पूरक ग्रन्थ लगता है जो मूलकथा में छूट गए किस्सों को विस्तार देता है। इसमें कई अन्य कथाओं (जिनमें कई मूलकथा से विरोधाभासी भी हैं) के साथ ही सीता के परित्याग, कुश-लव के जन्म की कथा है। रामचरितमानस में उत्तरकाण्ड में केवल राम के राज्याभिषेक और शासन का वर्णन है और कागभुशुंडि की कथा है।
अन्ततः कुछ ऐसे तथ्य भी बताना सही रहेगा जो रामायण एवं रामचरितमानस दोनों में ही नहीं हैं परन्तु जनमानस में प्रचलित हैं। यह कदाचित पुराणों एवं कालिदास कृत रघुवंश से जनमानस में फैले होंगे -
कहीं भी हनुमान को रुद्रावतार नहीं कहा गया है।
किसी भी वानर के पास कोई हथियार (गदा आदि) नहीं थी। उनके हथियार नख, दाँत, पत्थर, पहाड़ और पेड़ ही थे। अभी गदा के बिना हनुमान की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
श्रवणकुमार का माता-पिता को लेकर काँवड़ यात्रा का वर्णन नहीं है। वह अपने पिता के आश्रम में सपरिवार तपस्या करता था।
सीताहरण में पुष्पक विमान का प्रयोग नहीं हुआ था।
शबरी के जूठे बेरों का कहीं वर्णन नहीं है।
युद्ध में बालि के प्रतिद्वंदी का आधा बल बालि को मिलने का भी कोई वर्णन नहीं है।
सेतुबन्ध के समय किसी गिलहरी का वर्णन नहीं है।
लक्ष्मण को शक्ति मेघनाद ने नहीं रावण ने मारी थी। मेघनाद ने पहली बार नागपाश और दूसरी बार ब्रह्मास्त्र द्वारा राम-लक्ष्मण दोनों को मूर्छित कर दिया था, जिन्हें गरुड़ एवं संजीवनी बूटी द्वारा पुनः चेतना मिली।
अहिरावण, महिरावण, सुलोचना, रावण की मृत्यु के समय लक्ष्मण को उपदेश, मन्दोदरी का विभीषण से विवाह, अयोध्या में कर प्राप्ति हेतु धर्मकाँटा, राम की मुद्रिका का छिद्र में गिरना और हनुमान द्वारा उसे ढूँढना आदि का वर्णन नहीं है।
कुश-लव के द्वारा अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को पकड़ने और युद्ध का कोई वर्णन नहीं है।
कहीं भी हनुमान को रुद्रावतार नहीं कहा गया है।
किसी भी वानर के पास कोई हथियार (गदा आदि) नहीं थी। उनके हथियार नख, दाँत, पत्थर, पहाड़ और पेड़ ही थे। अभी गदा के बिना हनुमान की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
श्रवणकुमार का माता-पिता को लेकर काँवड़ यात्रा का वर्णन नहीं है। वह अपने पिता के आश्रम में सपरिवार तपस्या करता था।
सीताहरण में पुष्पक विमान का प्रयोग नहीं हुआ था।
शबरी के जूठे बेरों का कहीं वर्णन नहीं है।
युद्ध में बालि के प्रतिद्वंदी का आधा बल बालि को मिलने का भी कोई वर्णन नहीं है।
सेतुबन्ध के समय किसी गिलहरी का वर्णन नहीं है।
लक्ष्मण को शक्ति मेघनाद ने नहीं रावण ने मारी थी। मेघनाद ने पहली बार नागपाश और दूसरी बार ब्रह्मास्त्र द्वारा राम-लक्ष्मण दोनों को मूर्छित कर दिया था, जिन्हें गरुड़ एवं संजीवनी बूटी द्वारा पुनः चेतना मिली।
अहिरावण, महिरावण, सुलोचना, रावण की मृत्यु के समय लक्ष्मण को उपदेश, मन्दोदरी का विभीषण से विवाह, अयोध्या में कर प्राप्ति हेतु धर्मकाँटा, राम की मुद्रिका का छिद्र में गिरना और हनुमान द्वारा उसे ढूँढना आदि का वर्णन नहीं है।
कुश-लव के द्वारा अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को पकड़ने और युद्ध का कोई वर्णन नहीं है।
جاري تحميل الاقتراحات...