मन्त्र के ऋषि, छन्दस्, देवता, बीज, शक्ति, तथा कीलक नामक छह अंग होते है।और इन अंगों के साथ मंत्र कैसे कार्य करता है? इन अंगों को मंत्र के साथ ऋषिगणों ने क्यूँ जोड़ा है?
इनमे से कई मन्त्रों के साथ नमः, स्वाहा, वषट्, हुं, वौषट् तथा फट् पदों के साथ सिर, मुख, ह्रदय, गुदा, चरण तथा नाभि में न्यास किया जाता है।
उदाहरण के लिए भगवती दुर्गा के महामन्त्र "ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः" के
ऋषि नारद,
छन्दस् गायत्री,
देवता दुर्गा,
बीज दुं तथा
शक्ति ह्रीं है।
1-ऋषि --इसका उच्चारण करते समय सिर के उपरी के भाग में इनकी अवस्था मानी जाती हैं।
2-छंद -गर्दन में
3-देवता -ह्रदय में
4-कीलक -नाभि स्थान पर
5-बीजं- कामिन्द्रिय स्थान पर
6-शक्ति - पैरों में (निचले हिस्से पर)
7-उत्कीलन--- हांथो में
-ऋषि, छन्द,देवता का विन्यास किए विना,जो मन्त्र-जप किया जाता है,उसका फल तुच्छ यानी न्यून हो जाता है। अतः साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए न्यास द्वारा इनसे तादात्म्य स्थापित करना परमावश्यक है। हम पाते हैं कि प्रायः मन्त्र या स्तोत्र के विनियोग में ही इन बातों की चर्चा रहती है,यानी जिस मन्त्र का हम जप करने जा रहे हैं, अथवा स्तोत्र-पाठ करने जा रहे हैं,उसके ऋषि,छन्द और देवता कौन हैं- यह जानना-करना आवश्यक है। कहीं-कहीं और भी कुछ चर्चा जुड़ी रहती है,यथा बीज,शक्ति,कीलक,और अभीष्ट फल।
-नियम है कि जहां जितनी बातों की चर्चा हो,वहां साधना में उतने का ही प्रयोग किया जाना चाहिए,अन्यथा क्रिया न्यूनाधिक दोष-युक्त(त्रुटि-पूर्ण) कही जायेगी,और परिणाम भी तदनुरुप ही होगा।
1-ऋषि- परमात्मा और गुरु का स्थान शिर में सर्वमान्य है,अतः मन्त्र के ऋषि का न्यास शिर में ही किया जाना चाहिए। शिर के स्पर्श करते है
2-छन्द- छन्द शब्द में ‘छ’ इच्छा वाचक,और ‘द’ दानार्थक है- देने अर्थ में। इस प्रकार अभीष्ट फल देने वाला मन्त्र ही है,जो गुरु-मुख से प्राप्त होता है,शिष्य की कर्ण-गुहा में। इस क्रम में आत्मज्योति मूलाधार से उठ कर हृदयादि से होते हुए,सहस्रदलपद्म में आकर प्रतिष्ठित होती है।
मन्त्रमय छन्द का न्यास मुख में किया जाना चाहिए,क्यों कि साधक द्वारा जो मन्त्रोच्चारण किया जायेगा- अक्षरों का,उसका स्थान मुख ही है। मुख में छन्द-न्यास करने की मुद्रा वैसी ही होगी,जैसे पांचों अंगुलियों को एकत्र करके हम भोज्य-ग्रास लेते हैं। इस सम्बन्ध में ध्यान दिलाना चाहेंगे कि साधक का भोजन हाथ से ही होना चाहिए,न कि आधुनिक उपकरण- कांटे-चम्मच से, क्योंकि उपकरणों की सहायता से लिया गया ग्रास पंचतत्त्वात्मक ऊर्जा से वंचित रह जाता है।
-देवता- शब्द का अर्थ मंत्र में देवत्व(देव-भाव)प्राप्त करना,जिसका मूल स्थान हृदय है। अतः देवता का न्यास यहीं करना चाहिए। न्यास की यहां मुद्रा होगी- खुली हथेली से हृदय का सानुभूति पूर्वक स्पर्श।
इनमे से कई मन्त्रों के साथ नमः, स्वाहा, वषट्, हुं, वौषट् तथा फट् पदों के साथ सिर, मुख, ह्रदय, गुदा, चरण तथा नाभि में न्यास किया जाता है।
उदाहरण के लिए भगवती दुर्गा के महामन्त्र "ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः" के
ऋषि नारद,
छन्दस् गायत्री,
देवता दुर्गा,
बीज दुं तथा
शक्ति ह्रीं है।
1-ऋषि --इसका उच्चारण करते समय सिर के उपरी के भाग में इनकी अवस्था मानी जाती हैं।
2-छंद -गर्दन में
3-देवता -ह्रदय में
4-कीलक -नाभि स्थान पर
5-बीजं- कामिन्द्रिय स्थान पर
6-शक्ति - पैरों में (निचले हिस्से पर)
7-उत्कीलन--- हांथो में
-ऋषि, छन्द,देवता का विन्यास किए विना,जो मन्त्र-जप किया जाता है,उसका फल तुच्छ यानी न्यून हो जाता है। अतः साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए न्यास द्वारा इनसे तादात्म्य स्थापित करना परमावश्यक है। हम पाते हैं कि प्रायः मन्त्र या स्तोत्र के विनियोग में ही इन बातों की चर्चा रहती है,यानी जिस मन्त्र का हम जप करने जा रहे हैं, अथवा स्तोत्र-पाठ करने जा रहे हैं,उसके ऋषि,छन्द और देवता कौन हैं- यह जानना-करना आवश्यक है। कहीं-कहीं और भी कुछ चर्चा जुड़ी रहती है,यथा बीज,शक्ति,कीलक,और अभीष्ट फल।
-नियम है कि जहां जितनी बातों की चर्चा हो,वहां साधना में उतने का ही प्रयोग किया जाना चाहिए,अन्यथा क्रिया न्यूनाधिक दोष-युक्त(त्रुटि-पूर्ण) कही जायेगी,और परिणाम भी तदनुरुप ही होगा।
1-ऋषि- परमात्मा और गुरु का स्थान शिर में सर्वमान्य है,अतः मन्त्र के ऋषि का न्यास शिर में ही किया जाना चाहिए। शिर के स्पर्श करते है
2-छन्द- छन्द शब्द में ‘छ’ इच्छा वाचक,और ‘द’ दानार्थक है- देने अर्थ में। इस प्रकार अभीष्ट फल देने वाला मन्त्र ही है,जो गुरु-मुख से प्राप्त होता है,शिष्य की कर्ण-गुहा में। इस क्रम में आत्मज्योति मूलाधार से उठ कर हृदयादि से होते हुए,सहस्रदलपद्म में आकर प्रतिष्ठित होती है।
मन्त्रमय छन्द का न्यास मुख में किया जाना चाहिए,क्यों कि साधक द्वारा जो मन्त्रोच्चारण किया जायेगा- अक्षरों का,उसका स्थान मुख ही है। मुख में छन्द-न्यास करने की मुद्रा वैसी ही होगी,जैसे पांचों अंगुलियों को एकत्र करके हम भोज्य-ग्रास लेते हैं। इस सम्बन्ध में ध्यान दिलाना चाहेंगे कि साधक का भोजन हाथ से ही होना चाहिए,न कि आधुनिक उपकरण- कांटे-चम्मच से, क्योंकि उपकरणों की सहायता से लिया गया ग्रास पंचतत्त्वात्मक ऊर्जा से वंचित रह जाता है।
-देवता- शब्द का अर्थ मंत्र में देवत्व(देव-भाव)प्राप्त करना,जिसका मूल स्थान हृदय है। अतः देवता का न्यास यहीं करना चाहिए। न्यास की यहां मुद्रा होगी- खुली हथेली से हृदय का सानुभूति पूर्वक स्पर्श।
कीलक - शरीर का केन्द्र नाभिमंडल है। कीलन का कार्य यहीं किया जाता है। यह भी एक प्रकार का सुरक्षा-कवच है,किन्तु कवच से जरा भिन्न है इसे केन्द्रीकरण भी कह सकते हैं। पूरी शक्ति को एकत्र कर के रख देने जैसा,जहां पूरी तरह सुरक्षा मिल जाय। इस कीलन के विपरीत की क्रिया निष्कीलन की होती है,जिसका प्रयोग विशेषरुप से कीलित मन्त्रों के लिए करना अनिवार्य होता है। निष्कीलन न्यास का अंग नहीं है।
5-बीज - बीज वीर्य या रज(पुरुष-स्त्री)का प्रतीक है ।साधना क्रम में बीज के न्यास (स्थापना) का तात्पर्य है कि समुचित स्फुरण और विकास कुण्डलिनी के साथ ऊर्ध्वमुखी हो,और समुचित फल साधक को प्राप्त हो सके
6-शक्ति- शरीर को चलायमान बनाने का काम करती है वैसे ही मंत्र में शक्ति इसको चलाने का कार्य करती है,शक्ति के बिना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शव भांति है इसलिए मन्त्रों के अंगों को कुछ इस तरह बनाया गया है जिस से वह श्रद्धा से पढ़ने वाले भक्तों को पूर्ण फल दे सके!
उत्कीलन/अभीष्ट फल उत्कीलन इतना ही है कि ‘परस्पर दो और लो’ मन्त्रों का स्पष्ट उच्चारण एवं शुद्ध भाव होना अत्यन्त अनिवार्य है अन्यथा विफल हो जाना सम्भव है।परस्पर व्यवहार है ..भगवान योगीश्वर का स्पष्ट कथन है कि श्री जगदम्बा माता के अर्पण करो फिर उन्हीं से लो, यह अर्पण करना क्या है? बस यही कि पहिले कुछ निःस्वार्थ हो कर तो करो कि केवल हाथ फैला कर लेने को ही उत्सुक हो , भजन, पाठ, पूजन, अर्चन, वन्दन, अनुष्ठान इत्यादि सभी कुछ, पहिले निःस्वार्थ भाव से राग रहित हो कर, निष्काम हो कर करो ।
मातृका न्यासमातृका न्यास मातृका अर्थात् वाणी। हमारी वाणी में सरस्वती का निवास माना जाता है। मातृका न्यास में साधक माता सरस्वती को वेद मंत्रों की शक्ति से लीला करते हुए अनुभव करता है। हम इस न्यास से बुद्धि, मोह-ममता के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और हमारी साधना सफल होती हैं। सही मायनो मे हमे न्यास से साधना मे सुरक्षा मिलती हैं। न्यास करने से कभी भी देवता के भंयकर रुप मे दर्शन नही होते हैं और साधना मे पूर्ण सफलता मिलेगी। जैसा कि इस न्यास के नाम से ही स्पष्ट है- इसमें मातृकाओं अर्थात् वर्णों(अक्षरों)की स्थापना शरीर के विशिष्ट अंगों में विधि पूर्वक की जाती है। अकारादि वर्णमाला का ही सांकेतिक नाम‘मातृका’ है। वर्ण या अक्षर शब्द-ब्रह्म या वाक् शक्ति के स्वरुप हैं। इनका सूक्ष्म रुप विमर्श-शक्ति के नाम से ख्यात है,जिसे परावाक् कहतें हैं, जिसमें स्फुरणा मात्र होती है।
5-बीज - बीज वीर्य या रज(पुरुष-स्त्री)का प्रतीक है ।साधना क्रम में बीज के न्यास (स्थापना) का तात्पर्य है कि समुचित स्फुरण और विकास कुण्डलिनी के साथ ऊर्ध्वमुखी हो,और समुचित फल साधक को प्राप्त हो सके
6-शक्ति- शरीर को चलायमान बनाने का काम करती है वैसे ही मंत्र में शक्ति इसको चलाने का कार्य करती है,शक्ति के बिना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शव भांति है इसलिए मन्त्रों के अंगों को कुछ इस तरह बनाया गया है जिस से वह श्रद्धा से पढ़ने वाले भक्तों को पूर्ण फल दे सके!
उत्कीलन/अभीष्ट फल उत्कीलन इतना ही है कि ‘परस्पर दो और लो’ मन्त्रों का स्पष्ट उच्चारण एवं शुद्ध भाव होना अत्यन्त अनिवार्य है अन्यथा विफल हो जाना सम्भव है।परस्पर व्यवहार है ..भगवान योगीश्वर का स्पष्ट कथन है कि श्री जगदम्बा माता के अर्पण करो फिर उन्हीं से लो, यह अर्पण करना क्या है? बस यही कि पहिले कुछ निःस्वार्थ हो कर तो करो कि केवल हाथ फैला कर लेने को ही उत्सुक हो , भजन, पाठ, पूजन, अर्चन, वन्दन, अनुष्ठान इत्यादि सभी कुछ, पहिले निःस्वार्थ भाव से राग रहित हो कर, निष्काम हो कर करो ।
मातृका न्यासमातृका न्यास मातृका अर्थात् वाणी। हमारी वाणी में सरस्वती का निवास माना जाता है। मातृका न्यास में साधक माता सरस्वती को वेद मंत्रों की शक्ति से लीला करते हुए अनुभव करता है। हम इस न्यास से बुद्धि, मोह-ममता के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और हमारी साधना सफल होती हैं। सही मायनो मे हमे न्यास से साधना मे सुरक्षा मिलती हैं। न्यास करने से कभी भी देवता के भंयकर रुप मे दर्शन नही होते हैं और साधना मे पूर्ण सफलता मिलेगी। जैसा कि इस न्यास के नाम से ही स्पष्ट है- इसमें मातृकाओं अर्थात् वर्णों(अक्षरों)की स्थापना शरीर के विशिष्ट अंगों में विधि पूर्वक की जाती है। अकारादि वर्णमाला का ही सांकेतिक नाम‘मातृका’ है। वर्ण या अक्षर शब्द-ब्रह्म या वाक् शक्ति के स्वरुप हैं। इनका सूक्ष्म रुप विमर्श-शक्ति के नाम से ख्यात है,जिसे परावाक् कहतें हैं, जिसमें स्फुरणा मात्र होती है।
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