व्यास उन्हे कई कहानियां सुनाते है उनका ढांढस बांधने के लिए, इनमें से एक कहानी है की कैसे राजा सृंजय को नारद ने सोलह राजाओं की कहानी सुनाई थी, सृंजय के पुत्र की मृत्यु पर। और उन्हें बताया कि कैसे इतने महान राजाओं को भी एक न एक दिन मृत्यु से हार मारनी पड़ी तो आपके पुत्र क्या है।
दूसरी बार सोलह राजाओं की कहानी महाभारत में तब आती है जब महाभारत के युद्ध समाप्ति के बाद युधिष्ठिर युद्ध के परिणामों की वजह से शोक में डूब जाते है, और राज्य त्याग कर वन प्रस्थान का निर्णय लेते है। ऐसे में कई लोगो द्वारा इनको समझाया जाता है, इनमे से एक भगवान कृष्ण थे।
कृष्ण, युधिष्ठिर को वही सोलह राजाओं वाली कहानी सुनाते है की कैसे नारद ने राजा सृंजय को वो कहानी सुनाई थी जिसमें इतने महान राजा जिनके गुणों की गिनती नहीं है उनको भी इस धरती से जाना पड़ा था। ये दोनो जगह महाभारत में कहानी बिल्कुल एक जैसी है, सिर्फ दूसरी बार में थोड़ी संक्षिप्त में
है। लेकिन इन दोनो कहानियों में एक बहुत बड़ा अंतर है की इसमें सोलह में से पंद्रह राजाओं के नाम तो एक ही है दोनो कहानियों में पर सोलहवें का नाम दोनो में अलग है। पंद्रह राजा थे: १ राजा मरुत्त, २ राजा सुहोत्र, ३ राजा पौरव (बृहद्रथ), ४ राजा शिबि, ५ भगवान राम ६ राजा भगीरथ, ७ राजा दिलीप
८ राजा मांधाता, ९ राजा ययाति, १० राजा अम्बरीष, ११ राजा शशबिंदु, १२ राजा गय, १३ राजा रंतिदेव, १४ राजा भरत, १५ राजा पृथु। ये पंद्रह राजा तो दोनो कहानियों में एक ही है और एक दो को छोड़ कर लगभग एक ही क्रम में भी है। लेकिन सोलहवें में जहां एक सूची में राजा सगर का विवरण है तो दूसरी
में परशुरामजी का। राजा सगर सही मायने में एक महान राजा थे और उनका इस सूची में आना कोई आचार्यजनक बात नही है पर परशुरामजी का इन राजाओं की सूची में नाम बिल्कुल कृत्रिम सा लगता है, ना तो परशुराम कही के राजा थे, और ना ही वो हमारे पौराणिक ग्रंथों के हिसाब से कभी मरे है, जो की कहानी का
मुख्य उद्देश्य था बताना की कितने भी महान होने के बावजूद भी इन सब राजाओं को आखिरकार तो मृत्यु के चरण में जाना ही पड़ा। इससे यही प्रतीत होता है की मूल रूप से इन सोलह राजाओं की कहानी में राजा सगर का ही नाम था जिसको एक जगह से हटा के उनकी जगह बाद में परशुरामजी का नाम डाला गया।
सगर का नाम हटाने का एक विशेष कारण भी प्रतीत होता है, हैहय वंशी क्षत्रियों के उत्तर भारत का सदियों से चला आ रहा आक्रमण का सिलसिला था उसको समाप्त करने का श्रेय अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर को ही जाता है। इस तरह से हैहय वंशी क्षत्रियों का उत्तर भारत से सफाया करने का बढ़ा चढ़ा
के जो विवरण दिया जाने लगा उसमें परशुराम का विवरण भी जुड़ते रहा। काफी जगह पर ये भी लिखा हुआ है की राजा सगर ने परशुराम के दिए हुए अस्त्र से ही हैहय क्षत्रियों का दमन किया। इससे पता चलता है की पहले परशुराम का नाम सगर की हैहयों को हराने में सहायता करने के रूप में हुआ। धीरे धीरे
इस कहानी में और कहानियां जुड़ती गई और कही जगह पर हैहयों का दमन करने का पूरा श्रेय परशुरामजी को दिया गया और सगर का नाम हटा के परशुरामजी का नाम लगा दिया गया जैसा की महाभारत की ये सोलह राजाओं की कहानियां से भी प्रतीत होता है। बाद में और बढ़ा चढ़ाने के चक्कर में पूरे हैहयों का और
बाद में पूरे क्षत्रियों का ही एक बार नही बल्कि इक्कीस बार संहार करने की कहानी भी उनके साथ बन गयी। ये सर्वविदित है की महाभारत का भृगु गोत्र के ब्राह्मणों द्वारा काफी रूपांतरण किया गया था। परशुरामजी जो स्वयं भृगु गोत्र से थे, उनका विवरण बढ़ा चढ़ा के महाभारत में डालना इसी
प्रक्रिया का हिस्सा था। ये जरूर है की भृगु गोत्र के ब्राह्मण पहले हैहयों के यहां ही होतृ थे। और उनमें कुछ विवाद होने से भार्गवों को उत्तर भारत की और पलायन करना पड़ा। लेकिन उसमें बाद में बहुत सी कहानियां जोड़ दी गई जिनकी वास्तविकता से कोई लेना देना नही है। परशुरामजी को
क्षत्रिय विरोधी बताना गलत है और हैहयों के विनाश वाली बात भी गलत है (क्षत्रियों के विनाश की बात तो बहुत दूर है)। महाभारत में कही जगह पर भार्गव श्रेष्ठता की इस तरह की कई कहानियां है, हालांकि रामायण में महाभारत के मुकाबले इन कहानियों का पूर्णतः अभाव है। विचारणीय बात
है की क्षत्रियों के 21 बार विनाश और पुनः उत्पति की मनगढ़ंत कहानी महाभारत में एक बार नही दो बार नही बल्कि पूरे 10 बार पूरी–पूरी लिखी हुई है, कई बार तो इसको क्षत्रियों के (स्वयं भगवान कृष्ण के) मुख से बुलायी गयी है। एक ही पुस्तक में एक ही कहानी को 10 बार विस्तृत रूप में देने से ही
थोड़ा अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है की महाभारत में किस तरह से जोड़ तोड़ किया गया है।
PS: इसमें ये भी बात ध्यान देने योग्य है की १० बार आने वाली इस कथा का महाभारत की मुख्य कथा से दूर दूर तक कोई लेना देना नही है। तो इस तरह की कहानी जिसका मुख्य कथा से कोई संबंध ही नही है उसको बार बार उस मुख्य कथा में क्यों डाला गया यदि इसका उद्देश्य कुछ और नहीं होता तो।
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