जब भगवान का ब्याह अपने भाइयों सहित हो गया और विवाह मंडप मे चारो भाई अपनी-२ अर्धांगिनीयों सहित बैठे तो इस दृष्य की उपमा तुलसीबाबा ने ऐसे दी:
"सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं।
जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥"~ श्रीरामचरितमानस(बालकाण्ड)
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cc @Aadii009
"सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं।
जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥"~ श्रीरामचरितमानस(बालकाण्ड)
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cc @Aadii009
भावार्थ:- सब सुंदरी दुलहिनें सुंदर दूल्हों के साथ एक ही मंडप में ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीव के हृदय में चारों अवस्थाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) अपने चारों स्वामियों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म) सहित विराजमान हों।
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और इसकी व्याख्या पंडित विजयानंद त्रिपाठी ने अपनी मानस की टीका में ऐसे की:
"इस समय चारों सुन्दरियाँ अपने अपने सुन्दर वरों के साथ एक ही मण्डप में शोभायमान हैं। इस शोभा की उपमा देते हुए कवि कहते हैं कि जैसे जीव के हृदय में चारों अवस्थाएँ अपने अपने विभु के साथ विराजमान हों।
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"इस समय चारों सुन्दरियाँ अपने अपने सुन्दर वरों के साथ एक ही मण्डप में शोभायमान हैं। इस शोभा की उपमा देते हुए कवि कहते हैं कि जैसे जीव के हृदय में चारों अवस्थाएँ अपने अपने विभु के साथ विराजमान हों।
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यहाँ जनकपुर है । अतः प्रधानता सुन्दरियों की है। उन्हीं की अपने अपने वरों के साथ सुशोभित होने की उपमा दी जा रही है ।
अवस्थाएँ चार हैं : जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। इनके विभु क्रम से विराट्, हिरण्यगर्भं, ईश्वर और ब्रह्म हैं ।
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अवस्थाएँ चार हैं : जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। इनके विभु क्रम से विराट्, हिरण्यगर्भं, ईश्वर और ब्रह्म हैं ।
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यहाँ तुरीयावस्था सीताजी हैं और उनके विभु ब्रह्म राम हैं । यथा : तमेकमद्भुतं प्रभुं तुरीयमेव केवलम् । रामजी के सदृश भरतजी हैं । यथा भरत राम ही की अनुहारी । सहसा लखि न सकहि नर नारी । और तुरीय के सदृश ही सुषुप्ति हैं । अतः सुषुप्ति के विभु माण्डवीपति भरतजी हैं ।
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तुरीय और सुषुप्ति अवस्था भी ऐसी मिलती जुलती हैं कि सहसा साधक को लखाई नहीं पड़तीं कि उसे सुषुप्ति हो गई या समाधि लग गई तथा सहसा ब्रह्म और ईश्वर में भेद लखाई नहीं पड़ता । सुषुप्ति और स्वप्न का साथ है। इसी भाँति उनके विभुओं का भी साथ है ।
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वहाँ स्वप्न के विभु की उपमा शत्रुघ्नजी के साथ ठीक बैठती है । क्योंकि उनका साथ भरतजी से है । यथा: भरत शत्रुहन दूनों भाई । प्रभु सेवक जिमि प्रीति बढ़ाई। और स्वप्न तथा जाग्रत् में अत्यन्त सादृश्य है। स्वप्न देखता हुआ पुरुष अपने को जागता हुआ ही उस समय मानता है।
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एवं उनके विभुओं में भी सादृश्य है । हिरण्यगर्भ और विराट् एक रूप हैं । इस भाँति शत्रुघ्न और लक्ष्मण में सादृश्य है । यथा लखन सत्रुसूदन एक रूपा । नख सिख ते सब अंग अनूपा । अतः परिशेष न्याय से लक्ष्मणजी की उपमा जाग्रत के विभु से ठीक बैठती है।
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दूसरी बात यह है कि जाग्रत् और तुरीय का साथ है। तुरीय की प्राप्ति जाग्रत् से ही सम्भव है । सुषुप्ति या स्वप्न से कोई तुरीयावस्था को नहीं प्राप्त कर सकता। इसी भाँति इनके विभुओं का भी साथ हुआ । यथा भरत शत्रुहन दूनौ भाई । प्रभु सेवक जिमि प्रीति बड़ाई ।
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अतः जाग्रत् के विभु की उपमा लक्ष्मणजी के साथ है। तुरीय और सुषुप्ति अव्यक्तावस्था हैं । अतः इनके विभुओं राम और भरत का रङ्ग श्याम है और जाग्रत् तथा स्वप्न व्यक्तावस्था है । अतः इनके विभुओं लक्ष्मण और शत्रुघ्न का रंग गौर है । जाग्रत् का संस्कार ही स्वप्न है ।
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अतः जाग्रत् अवस्था ही ज्येष्ठ है सो उसके विभु लक्ष्मणजी शत्रुघ्नजी से ज्येष्ठ हैं ।
जीव का हृदय ही एक ऐसा स्थल है जहाँ सब कुछ सम्भव है। वहीं चारों अवस्थाएँ एकत्र रह सकती हैं।अतः जनकजी के मण्डप की उपमा जीव के हृदय से दी।"
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जीव का हृदय ही एक ऐसा स्थल है जहाँ सब कुछ सम्भव है। वहीं चारों अवस्थाएँ एकत्र रह सकती हैं।अतः जनकजी के मण्डप की उपमा जीव के हृदय से दी।"
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