9 تغريدة 1,171 قراءة Nov 30, 2022
"द्वारं किमेकं नरकस्य नारी "
इस एक श्लोक का सहारा लेकर आर्य समाजी कहते हैं कि आदि शंकराचार्य जी ने स्त्रियों को नर्क का द्वार बताया है।
अगर पहले दृष्टि में देखें तो यही प्रतीत होता है परंतु इसके पीछे का सत्य क्या है वह मैं आपको बताने का प्रयास करता हूं
यह वाकय आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी का है। उनकी एक पुस्तक है प्रश्नोत्तरी जिसमे ये प्रसंग है
इस पुस्तक मैं कुछ प्रश्न एक साधक करता है जो कोई भी हो सकता है और उसका गुरु उन प्रश्नों का उत्तर देता है।
इसी पुस्तक में यह वाकय है, "द्वारं किमेकं नरकस्य नारी "
अर्थात प्रश्न है, "नरक का द्वार कौन है?"
उत्तर दिया गया है, "नारी। "
हम चाहे तो यहीं पर उन्हें महिला विरोधी घोषित कर सकते हैं परंतु इसके लिए हमें आगे के श्लोक को और इसके पीछे के श्लोक को समझना होगा
बद्धो हि को यो विषयानुरागी को वा विमुक्तो विषये विरक्तः।
को वास्ति घोरो नरकः स्वदेहः तृष्णा क्षयः स्वर्गपदम किमस्ति।
कौन बंधन में है? जो विषयों से प्रेम करता है।
कौन मुक्त है? जो विषयों से विरक्त है।
घोर नरक क्या है? अपना शरीर।
स्वर्ग का पद क्या है? तृष्णा क्षय।
जैसा कि आपने पढ़ा कि यहां पर शंकराचार्य जी ने हमारे शरीर को ही घोर नरक कहा है।
तो क्या इसका अर्थ हम यह मान ले कि उन्होंने पूरे संसार के हर स्त्री पुरुष को नर्क वासी साबित कर दिया ऐसा तो नहीं ना कह सकते हैं
आगे पढ़ते है
संसारहृतकः श्रुतिजात्मबोधः को मोक्ष हेतुः कथिताः स एव ,द्वारं किमेकं नरकस्य नारी।
का स्वर्गदा प्राणभृतां अहिंसा।
संसार को हरने वाला कौन है? आत्मबोध।
क्या मोक्ष का हेतु है? वही आत्मबोध।
नरक का द्वार क्या है? नारी।
स्वर्ग को देने वाला क्या है? अहिंसा।
इसमें जैसा की आप देख रहे हैं वह पहले ही नरक क्या है यह पूछ चुका है और फिर पूछ रहा है कि उस नरक का द्वार क्या है?
उत्तर है कि अपना शरीर ही नर्क है और इसका द्वार नारी है।
अपना शरीर ही नर्क है इसका अर्थ है इसकी आसक्ति, इसे स्थायी मानना और इसमें ही रमे रहना , यह नर्क है।
यदि पुरष के मन की दृष्टि से विचार करें तो नारी में पुरुष का मन जितना आसक्त होता है उतना किसे और वस्तु में नहीं।
अतः देह की आसक्ति को बढ़ाने वाली होने से नारी नर्क (अपने ही शरीर की आसक्ति) का द्वार है।
अब आप कहेंगे कि यह भी नारी की निंदा है।
एकदम नहीं
यदि पुरुष स्त्री लोलुप है तो यह स्त्री का दोष नहीं है बल्कि पुरुष की लोलुपता का दोष है और इसीलिये गुरु उस साधक को सावधान कर रहा है कि स्त्री को भोग की दृष्टि से देखोगे तो अपने शरीर भिन्न आत्मा का।

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