5 تغريدة 21 قراءة Aug 13, 2022
'येन केन प्रकारेण रामे बुद्धिं निवेशयेत्।'
(कथा)
रामायण लिखने के पश्च्यात महर्षि वाल्मीकि के मन में आया कि मैं सबसे पहले इसे कैलाश ले जाकर महादेव के चरणों मे अर्पित कर दूँ, लेकिन कैलाश मार्ग में ही उन्हें हनुमानजी साधना करते मिल गए, तब हनुमानजी ने हर्षित होकर उन्हें अपने वज्रनख से शिला पर उकेरी गई रामायण दिखलाई।
वाल्मीकिजी के उसका अध्यन करते वक्त झर-झर आंसू गिरने लगे, हनुमानजी की सरल सरस शैली में काव्य देखकर उनके मन में संशय हो आया कि इतनी अध्भुत काव्य रचना के बाद मेरी रामायण कोई नही पढ़ेगा (व्यर्थ हो जाएगी) तब हनुमानजी के उनसे आग्रह करके चिंता का कारण पूछा व उसे जानने के बाद हनुमानजी ने
एक कंधे पर महर्षि वाल्मीकिजी को बैठाया और दूसरे हाथ मे उस शिला को लेकर समुद्र के मध्य 'श्रीरामार्पणमस्तु' कहकर शिला विसर्जित कर दिया, वाल्मीकि जी को बड़ा खेद हुआ तब हनुमानजी ने कहा-
मैने तो बस येन-केन प्रकार से रामजी में अपनी बुद्धि लगाने के लिए इस काव्य की रचना की थी।
तब उन्होंने हनुमानजी से वरदान लिया कि मैं कलियुग में वापस 'तुलसीदास जी' के रूप में जन्म लेकर उसी तरह आसान काव्य शैली में रामायण की रचना करूँगा।

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