राजगद्दी के बाद भालु-वानरों को विदा करते समय अवधनाथ भगवान् श्रीरामजी कहते है- 'हे सेवको और भक्तो! मुझको अपने भाई, राज्यश्री, स्वयं श्रीजानकीजी, अपना शरीर, घर, परिवार सब उतने प्रिय नहीं हैं, जितने कि तुम लोग हो! मैं यह सत्य-सत्य कह रहा हूँ, यही मेरी विरदावली है।
वैसे तो यह रीति है कि सेवक सभी को प्यारे होते हैं, परन्तु मुझको अपने भक्त पर सबसे बढ़कर प्रीति रहती।'
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