#महेश्वर_सूत्र
नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥
#Thread
अर्थात:- "नृत्य/ताण्डव की समाप्ति पर नटराज शिव ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना की पूर्ति के लिये नौ और पांच अर्थात कुल चौदह बार डमरू बजाया।
नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥
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अर्थात:- "नृत्य/ताण्डव की समाप्ति पर नटराज शिव ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना की पूर्ति के लिये नौ और पांच अर्थात कुल चौदह बार डमरू बजाया।
इस प्रकार चौदह शिवसूत्रों का ये जाल (वर्णमाला) प्रकट हुयी।"
इन्हीं ध्वनियों से व्याकरण का प्रकाट्य हुआ। इसलिये व्याकरण सूत्रों के आदि-प्रवर्तक भगवान नटराज को माना जाता है।
इन्हीं ध्वनियों से व्याकरण का प्रकाट्य हुआ। इसलिये व्याकरण सूत्रों के आदि-प्रवर्तक भगवान नटराज को माना जाता है।
महर्षि पाणिनि ने इन सूत्रों को देवाधिदेव शिव के आशीर्वाद से प्राप्त किया जो कि पाणिनीय संस्कृत व्याकरण "अष्टाध्यायी का आधार बना।
श्रावण मास में शिव के डमरू से प्राप्त 14 सूत्रों को एक श्वास में बोलने का अभ्यास किया जाता है।
श्रावण मास में शिव के डमरू से प्राप्त 14 सूत्रों को एक श्वास में बोलने का अभ्यास किया जाता है।
मान्यता है कि इस मंत्र से कई बीमारियों का इलाज कर सकते हैं तथा कोई भी कार्य सिद्ध कर सकते हैं। इनकी एक माला (108 मंत्र) का जप सावन में अवश्य करने का प्रयास करें, अच्छा रहेगा इसके बाद भी प्रतिदिन करें।
शिवसूत्र रूप मंत्र
"अ इ उ ण्, ॠ ॡ क्, ए ओ ङ्, ऐ औ च्, ह य व र ट्, ल ण्, ञ म ङ ण न म्, झ भ ञ्, घ ढ ध ष्, ज ब ग ड द श्, ख फ छ ठ थ च ट त व्, क प य्, श ष स र्, ह ल्।
"अ इ उ ण्, ॠ ॡ क्, ए ओ ङ्, ऐ औ च्, ह य व र ट्, ल ण्, ञ म ङ ण न म्, झ भ ञ्, घ ढ ध ष्, ज ब ग ड द श्, ख फ छ ठ थ च ट त व्, क प य्, श ष स र्, ह ल्।
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