सनातन संवाद
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@banna88888

23 تغريدة 35 قراءة Apr 26, 2022
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"सो जा बेटा" आमेर का मान सिंह आ जाएगा... अफगानिस्तान कांपता था, राजा मान से।
तालिबान आतंक के कारण आज थर्रा रहे अफगानिस्तान की जमीन पर साढ़े चार सौ साल पहले आमेर नरेश मान सिंह ने अफगान फतेह का ऐसा लोम हर्षक इतिहास लिख दिया
था कि सदियों तक वहां की माताओं ने बच्चों को सुलाने के लिए लोरी की जगह राजा मान सिंह की कहानियां सुनाना शुरू कर दिया था। अभी कुछ वर्षो तक वहां के घरों में मान सिंह के नाम की दुहाई दी जाती थी।
भारत को तालिबान से आज कोई खतरा हो या ना हो लेकिन जब राजस्थान के वीरों ने
अफगानिस्तान की धरती को कंप कंपा दिया था। मां कहती थी बच्चा सो जा मानसिंह आ जाएगा।
जी हां अफगानिस्तान को हिला देने वाले आमेर और राजस्थान के अन्य वीरों की कुछ ऐसी ही बातें इतिहास में लिखी है, जिन को पढ़कर आज भी लोगों का सीना गर्व से फूल जाता है।
"मात सुनावे बालकां
खोफनाथ रण गाथ
काबुल अज भी भूली
बो खाण्डों बो हाथ
तालिबानियों को सबक सिखाने के लिए जहां अमेरिका को लगातार बीस साल तक एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा वहीं आमेर के राजा मानसिंह ने अपनी तलवार के जोर पर अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था।
मानसिंह वर्षों तक काबुल के गवर्नर रहे और उन्होंने वहां बेधड़क हो शासन किया। खास बात यह भी रही कि उनके बाद आए आमेर के पांच राजाओं और राजकुमारों ने भी अफगानिस्तान में तलवार चलाई और वहां के शासन की बागडोर को बखूबी से संभाला।
मानसिंह के साथ युद्ध लड़ने के लिए उनका
बेटा जगत सिंह भी काबुल गया था और उसने पिता की अनुपस्थिति में वहां के शासन का संचालन किया।जगत सिंह की याद में आमेर का जगत शिरोमणि मंदिर आज भी दुनिया में प्रसिद्ध है।मान सिंह की मृत्यु के बाद उनके वंशज आमेर नरेश मिर्जा राजा जयसिंह सन 1651 से 1653 तक तीन साल काबुल के सूबेदार रहे।
इनके बाद महाराजा रामसिंह प्रथम ने सन 1676 में काबुल की प्रशासनिक व्यवस्था संभाली। आमेर के बीस वर्षीय युवराज किशन सिंह ने भी तीन साल तक काबुल की सत्ता को संभाला। राम सिंह प्रथम की मृत्यु के समय महाराजा विष्णु सिंह उर्फ बिशन सिंह काबुल में थे।
विष्णु सिंह के पुत्र जयसिंह द्वितीय ने ही जयपुर बसाया था। जयपुर महाराजा माधो सिंह द्वितीय की स्टेट ट्रांसपोर्ट कोर सेना भी सन 1889 में अफगानों की लड़ाई में भाग लेने गई थी। आमेर राजाओं के साथ जयपुर रियासत में चोमू के राजा मनोहर दास ने भी अफगानिस्तान में अपनी तलवार चलाई थी।
ढूंढाड़ के कई सामंत भी मानसिंह के युद्ध अभियान में अफगानिस्तान गए थे। आमेर के कई अधिकारी भी उस जमाने में काबुल आते जाते रहते थे
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इतिहासकार लिखते हैं कि सिकंदर के बाद आमेर के मान सिंह प्रथम ही ऐसे सेनानायक हुए हैं जिन्हें दुर्गम पहाड़ी दर्रो वाले इलाके में विजय का झंडा
गाड़ने का श्रेय मिला। भारत में मुगल बादशाह अकबर का शासन था। आमेर के राजा मानसिंह मुगलों की सेना के मुख्य कमांडर थे ।
उस समय अफगानिस्तान का शासक मिर्जा मोहम्मद हकीम था। वह भारत के पंजाब क्षेत्र पर कब्जा करना चाहता था। अकबर के कई मुगल सेना नायकों ने मोहम्मद हकीम को परास्त करने का
प्रयास किया लेकिन वे सफल नहीं हो सके। तब अकबर ने 19 जुलाई 1559 में मानसिंह को प्रधान सेनापति बनाकर अफगानिस्तान पर हमला करने भेजा । मानसिंह की कछवाहा फौज ने काबुल ,कंधार इलाके में अफ़गानों कबीलों को फतह किया । 22 सितंबर सन 1581 में मानसिंह को काबुल का गवर्नर सहित उत्तरी सीमांत का
सेना कमांडर बनाया गया।
मान सिंह ने जयसिंह प्रथम को अफगानिस्तान की शासन व्यवस्था का भार सौंपा ।
मान सिंह ने ही काबुल के मिर्जा सुलेमान को पकड़कर बादशाह के दरबार में पेश किया । उन्होंने यूसुफजाई व अफरीदी कबीलों को पराजित कर चहार दर्रे पर कब्जा किया। मानसिंह ने अफगानिस्तान की
पहाड़ियों पर काबिज पठानों को परास्त कर अधीनता स्वीकार करवाई। मिर्जा राजा जयसिंह कूटनीतिक शासक थे। उन्होंने मान सिंह के जीते अफगानिस्तान पर राज किया।
वे फारसी और तुर्की भाषा जानते थे। काबुल पर कब्जा रखने से खुश हो शाहजहां ने 17 मार्च 1642 को शहजादा दारा शिकोह के साथ
मिर्जा राजा जयसिंह को कंधार की सुरक्षा के लिए भेजा । शाहजहां ने जयसिंह की शासन व्यवस्था से प्रभावित होकर उनको वस्त्र सिरोपा व रत्न जड़ित फूलदार कटार , एक घोड़ा व एक हाथी देकर सम्मानित किया। घोड़े की जीन सुनहरी थी। उस समय की कटार और मान सिंह का खांडा सिटी पैलेस के शस्त्रागार में
आज भी है। अफगानिस्तान पर जयपुर के राजाओं का शासन होने की वजह से वहां की कला संस्कृति का यहां पर समावेश हुआ। काबुल कंधार से कई परिवार आमेर लाकर बसाए गए । उनके वंशज जयपुर व आमेर में आज भी मिल सकते हैं।
भौगोलिक दृष्टि से अफगानिस्तान की स्थिति ऐसी है
जहां पर बड़ी शक्तियां अपने पैर जमाने के लिए बेचैन रही लेकिन आमेर के शासक मानसिंह की कछवाहा फौज ने वीरता दिखाई जिससे अफगानिस्तान को जीतने में सफलता मिली।
#राजा_मानसिंह_कछवाहा_आमेर
अगर राजा मानसिंह देशद्रोही है, तो मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ, भारत की प्रत्येक माता ऐसा ही गद्दार जने, फिर देशभक्तों की जरूरत ही नही है!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा पर इसके बनवाये हुए घाट आज भी काशी की रौनक बढ़ा रहीं है!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा...पर जिसने सोमनाथ मंदिर को मस्जिद से पुनः मंदिर बनाया था!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा पर जिसने जगन्नाथ पूरी मंदिर की पठानों से रक्षा की!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा पर जिसने बिहार के गया को मुस्लिमों से मुक्ति दिलाई और हज़ारो मंदिरो का निर्माण कराया!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा पर जिसने...हरिद्वार मे घाटों का निर्माण कराया!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा पर जिसने रामचरितमान्स की रचना करने वाले तुलसीदास को संरक्षण दिया!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा पर जिसने मीराबाई को अपने राज्य मे सम्मान दिया!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा पर जिसने मेरे आदर्श
ओर अपने मित्र महाराणा प्रताप जी...को युद्ध भूमि से सुरक्षित जाने दिया!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा पर जिसने पुरे भारत मे आतंक मचाने वाले पठानों का जड़ से समूल नाश कर दिया!
•मुझे गर्व है ऐसे राजा पर जिसने मुस्लिम आक्रानताओं के गढ़ पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बलुचीस्तान, तुर्की, ईरान आदि
क्षेत्र जहा बड़े बड़े तोप के...बन्दूक के कारखाने थे उसे नष्ठ कर दिया जिसके साथ ही मुस्लिम शासक कमजोर होने लगे और हिन्दुओ का बल बढ़ने लगा!
चलिए ये थी देशद्रोही मान सिंह की छोटी सी कहानी, अब आप अपने देशभक्तों की भी कहानी सुनाएं...?
आमेर परिवार ने मुगलो ने अपनी बेटी दी
, यह बात कोई साबित नही कर पाया, आमेर ने...करोड़ो हिन्दू बच्चियो की रक्षा अवश्य की, यह बात कोई भी साधारण सा इतिहासकार भी साबित कर देगा।
बनारस के लगभग सभी घाटों का निर्माण राजा मानसिंह ने करवाया फिलहाल आप सिर्फ वह घाट देखें, जो सीधे राजा मानसिंह के नाम पर ही है।...
#रघुकुलतिलक सनातन धर्म रक्षक राजा मानसिंह जी आमेर 🙏
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