सनातन संवाद
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@banna88888

14 تغريدة Apr 20, 2022
[#Thread]
पोस्ट पूरी अवश्य पढ़ें:- इस #लोकतंत्र में स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारा एवं राजनीतिक दल के निर्माण से #क्षत्रिय समाज को डर क्यों लगता है?
जबकि #यूरोपीय अर्थशास्त्री #एंगुस मेडिसिन के अनुसार क्षत्रियों के शासनकाल तक यह देश विश्व की सबसे #बड़ी
अर्थव्यवस्था (विश्व की जीडीपी का लगभग 35%)का निर्माता था।
लोकतंत्र की स्थापना से पूर्व क्षत्रिय समाज ने संक्रमण काल में #राम_कृष्ण_बुद्ध_महावीर के रूप में स्वतंत्र विचारधारा का नेतृत्व किया है।
लेकिन वर्तमान लोकतंत्र में विभिन्न विचारधाराओं
के #अधीन कार्य करके ही क्षत्रिय समाज खुश है। जबकि यह विचारधाराएं सभी वर्गों को जोड़ने में एवं देश को आर्थिक ताकत बनाने में #असफल रही हैं।
इस राष्ट्र के सभी वर्गों को जोड़ने के लिए और उनमें समन्वय स्थापित करने के लिए , एक बार क्षत्रियों को एक स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारा
का निर्माण कर,उसका #नेतृत्व करने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए।
क्षत्रियों ने हमेशा लोक कल्याण को #प्राथमिकता दी है। फिर चाहे उस लोक कल्याण के लिए क्षत्रियों को अपने राज्य एवं सत्ता का त्याग ही क्यों ना करना पड़ा हो।
असुरों के आतंक से आमजन की रक्षा करने के लिए
#श्रीराम ने 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया।
जरासंध के लगातार हमलों से जनता की सुरक्षा के लिए #श्रीकृष्ण ने द्वारिका पलायन स्वीकार किया।
जनता को सांसारिक दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए #श्रीबुद्ध और #श्रीमहावीर ने भी राज्य का परित्याग किया।
इस लोकतंत्र में क्षत्रियों के नेतृत्व में एक बार #पुनः स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारा की आवश्यकता है। जो इस राष्ट्र के लोगों के कल्याण, एकीकरण एवं आर्थिक समृद्धि के लिए कार्य कर सकें।
जो इस देश में राजनेता ,व्यापारी और अधिकारियों के #गठजोड़ को तोड़कर ,देश में #आम जनता के लिए
कल्याणकारी शासन स्थापित कर सकें।
इस देश ने कांग्रेसी विचारधारा , वामपंथी विचारधारा, समाजवादी विचारधारा और हिंदुत्ववादी विचारधारा का प्रयोग देख लिया ।लेकिन देश में #शांति एवं समन्वय स्थापित नहीं हो सका।
क्षत्रियों को भी एक #नई राजनैतिक विचारधारा का निर्माण कर
उस विचारधारा का नेतृत्व करने के लिए, स्वयं को मानसिक रूप से तैयार करने का प्रयास करना चाहिए।
किसी भी नई विचारधारा को तैयार करने के लिए पहले ( विधायक एवं सांसद के रूप में) #शून्य होना पड़ता है और कई वर्षों तक निरंतर जमीन पर संघर्ष करना पड़ता है।
जमीन पर संघर्ष का मतलब है कि आपको विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं एवं राजनीतिक सत्ता की सुविधाओं का #परित्याग करना पड़ेगा और राजनीतिक सत्ता का #उत्पीड़न झेलने के लिए तैयार होना पड़ेगा।
क्षत्रियों को सुविधाभोगी एवं पलायनवादी नहीं , बल्कि #संघर्षवादी होना चाहिए।
क्षत्रियों को जमीनी राजनीतिक संघर्ष से पलायन नहीं करना चाहिए।
जमीनी संघर्ष से पलायनवादी प्रवृत्ति की वजह से ही ,क्षत्रिय किसी स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारा का निर्माण एवं नेतृत्व नहीं कर पा रहे हैं।
स्वतंत्र राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से ही
क्षत्रिय समाज #विकल्प का बहाना बनाकर पलायनवादी राजनीति कर रहा है।
हजारों वर्षों तक लोक कल्याणकारी सुशासन देने वाला क्षत्रिय समाज, आज स्वतंत्र नेतृत्व तैयार करने से #डर रहा है।
सही अर्थों में इस लोकतंत्र में देश के 20 राज्यों में बहुतायत में निवास करने वाला क्षत्रिय समाज
अपनी स्वतंत्र राजनीतिक #क्षमता को भुला बैठा है।
#नोट:- विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के बाद से ,क्षत्रिय समाज में स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने वाले राजनेता अब दिखाई नहीं देते हैं।
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जिस आक्रामक शैली से राजनीति कर,स्वतंत्र राजनीतिक दल का
गठन कर ,केवल 1 वर्ष के जमीनी संघर्ष से ही ,केंद्र में प्रधानमंत्री पद प्राप्त किया ।लोकतंत्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे जमीनी संघर्ष वाले क्षत्रिय राजनेताओं का प्रादुर्भाव आवश्यक है।
#विशेष:- क्षत्रिय समाज में एक बहुत बड़ी कमी है कि इस लोकतंत्र में क्षत्रिय समाज किसी
अन्य समाज की बुद्धि से सोचता है ।
वह समाज क्षत्रिय समाज की बुद्धि में जो भर देता है। क्षत्रिय समाज उन विचारों का पालन करने लगता है
चाहे उन विचारों का पालन ,क्षत्रियों के लिए राजनीतिक एवं सामाजिक रूप से,आत्मघाती ही सिद्ध क्यों ना हुआ हो।
✍🏻पोस्ट लेखक- @TeamRajanyas

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