, यह उनकी बहादुरी को दर्शाता है। राणा सांगा' मेवाड़ के राजा थे। उनके शासनकाल में मेवाड़ अपने गौरव के शिखर पर पहुँच गया था। वे अपने शूरवीरता के कार्यों के लिए प्रख्यात थे।
राणा सांगा ने दिल्ली और मालवा के नरेशों के साथ अठारह युद्ध किये।
राणा सांगा ने दिल्ली और मालवा के नरेशों के साथ अठारह युद्ध किये।
इनमे से दो युद्ध दिल्ली के शक्तिशाली सुल्तान इब्राहीम लोदी के साथ लड़े गए। कहा जाता था कि मालवा के सुल्तान मुजफ्फर खान को युद्ध में कोई गिरफ्तार नहीं कर सकता था क्योंकि उसकी राजधानी ऐसी मजबूत थी कि वह दुर्भेद्य थी।
परन्तु पराक्रमी राणा सांगा ने केवल उसके दुर्ग पर ही अधिकार न किया किन्तु सुल्तान मुजफ्फर खान को बंदी बनाकर मेवाड़ ले आए। फिर उन्होंने सेनापति अली से रणथम्भोर के सुदृढ़ दुर्ग को छीन लिया।
अंत में राजा क़ी मुठभेड़ बाबर से हुई जो फरगना का सुल्तान था और देश विजय करके
अंत में राजा क़ी मुठभेड़ बाबर से हुई जो फरगना का सुल्तान था और देश विजय करके
काबुल का बादशाह बन गया था।
#कर्नलटाड के अनुसार, राणा सांगा की भारी और जोश से भरी फौज को देखकर बाबर घबरा गया था। साथ ही बयाना किले में बाबर की सेना की हार हुई थी। इस कारण खानवा के युद्ध से पहले बाबर ने एक संधि प्रस्ताव राणा सांगा के पास भेजा था,
#कर्नलटाड के अनुसार, राणा सांगा की भारी और जोश से भरी फौज को देखकर बाबर घबरा गया था। साथ ही बयाना किले में बाबर की सेना की हार हुई थी। इस कारण खानवा के युद्ध से पहले बाबर ने एक संधि प्रस्ताव राणा सांगा के पास भेजा था,
जिसमें लिखा कि सारी शर्तें राणा की होंगी, जिन्हें बाबर स्वीकार करेगा। साथ ही प्रति वर्ष कुछ कर भी अदा करेगा। परंतु यह संधि नहीं हो सकी, इसलिए 16 मार्च 1527 को युद्ध की घोषणा की गई।
बाबर राणा से कम शूरवीर और युद्ध-कुशल न था। दोनों में घोर युद्ध हुआ।
बाबर राणा से कम शूरवीर और युद्ध-कुशल न था। दोनों में घोर युद्ध हुआ।
एक विश्वासघाती सेनापति के कारण राणा सांगा क़ी हार हुई।बाबर ने राजपूती सेना के साहस का बखान किया है। कथन है कि तुर्कों के पैर उखड़ गए थे। पराजय दिखाई दे रही थी। तोपखाने ने आग बरसाई तब सांगा की जीती हुई बाजी हार में बदल गई। फिर भी सांगा और उनके वीर मरते दम तक लड़ते रहे।
।बाबर ने आगे लिखा कि वे मरना-मारना तो जानते हैं किंतु युद्ध करना नहीं जानते।कनिंघम लिखता है कि बाबर के पास सेना कम थी, परंतु दूर तक मार करने वाली बड़ी-बड़ी तोपें थी, जबकि राजपूत इससे अनभिज्ञ थे,
खानवा की पहाड़ियों पे आज भी गोलियों के निशान मौजूद हैं।
खानवा की पहाड़ियों पे आज भी गोलियों के निशान मौजूद हैं।
कोटिशः नमन शूरवीरों को..........🙏
|| जय क्षात्र धर्म ।।
|| जय क्षात्र धर्म ।।
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