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जौहर का नाम सुनते ही आपके मन मे सर्वप्रथम क्या आता है
की क्षत्राणियो द्वारा जब उनके पति युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हैं तो उनके लिए अपने सतित्व की रक्षा हेतु अग्निस्नान मगर इतिहास में एक ऐसा जौहर भी है जो राजा के जीतने के बाद भी हूआ....[1]
जौहर का नाम सुनते ही आपके मन मे सर्वप्रथम क्या आता है
की क्षत्राणियो द्वारा जब उनके पति युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हैं तो उनके लिए अपने सतित्व की रक्षा हेतु अग्निस्नान मगर इतिहास में एक ऐसा जौहर भी है जो राजा के जीतने के बाद भी हूआ....[1]
और वो जौहर था रणथंभौर के राजा हम्मीर देव के कालखंड का
एक बार 1299 ईसवी में अलाउद्दीन की सेना गुजरात से वापस लौट रही थी तभी उनके सेनापतियों में धन को लेकर झगड़ा हो गया था उनमें से दो मंगोल सेनापति मोहम्मद सा और केबरु ने रास्ते में रणथंबोर के राजा हमीर देव के महल में शरण ली थी.[2]
एक बार 1299 ईसवी में अलाउद्दीन की सेना गुजरात से वापस लौट रही थी तभी उनके सेनापतियों में धन को लेकर झगड़ा हो गया था उनमें से दो मंगोल सेनापति मोहम्मद सा और केबरु ने रास्ते में रणथंबोर के राजा हमीर देव के महल में शरण ली थी.[2]
इसके बाद जब अलाउद्दीन ने हमीर देव को दोनों सेनापतियों को सौंपने हम्मीर के नेतृत्व में रणथम्भौर के चौहानों ने अपनी शक्ति को काफी सुदृढ़ बना लिया और राजस्थान के विस्तृत भूभाग पर अपना शासन स्थापित कर लिया था। अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली के निकट चौहानों की बढ़ती हुई शक्ति को नहीं..[3]
देखना चाहता था, इसलिए संघर्ष होना अवश्यंभावी था।
अलाउद्दीन की सेना ने सर्वप्रथम छाणगढ़ पर आक्रमण किया। उनका यहाँ आसानी से अधिकार हो गया। छाणगढ़ पर मुगलों ने अधिकार कर लिया है, यह समाचार सुनकर हम्मीर ने रणथम्भौर से सेना भेजी।..[4]
अलाउद्दीन की सेना ने सर्वप्रथम छाणगढ़ पर आक्रमण किया। उनका यहाँ आसानी से अधिकार हो गया। छाणगढ़ पर मुगलों ने अधिकार कर लिया है, यह समाचार सुनकर हम्मीर ने रणथम्भौर से सेना भेजी।..[4]
चौहान सेना ने मुगल सैनिकों को परास्त कर दिया। मुगल सेना पराजित होकर भाग गई, चौहानों ने उनका लूटा हुआ धन व अस्त्र-शस्त्र लूट लिए। (ईस्वी 1301) में अलाउद्दीन खिलजी ने दुबारा चौहानों पर आक्रमण किया। छाणगढ़ में दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ।..[5]
इस युद्ध में हम्मीर स्वयं नहीं गया था। वीर चौहानों ने वीरतापूर्वक युद्ध किया लेकिन विशाल मुगल सेना के सामने कब तक टिकते। अन्त में सुल्तान का छाणगढ़ पर अधिकार हो गया।
तत्पश्चात् मुगल सेना रणथम्भौर की तरफ बढ़ने लगी। तुर्की सेनानायकों ने हमीर देव के पास सूचना भिजवायी..[6]
तत्पश्चात् मुगल सेना रणथम्भौर की तरफ बढ़ने लगी। तुर्की सेनानायकों ने हमीर देव के पास सूचना भिजवायी..[6]
कि हमें हमारे विद्रोहियों को सौंप दो, जिनको आपने शरण दे रखी है। हमारी सेना वापिस दिल्ली लौट जाएगी। लेकिन हम्मीर अपने वचन पर दृढ़ थे। मुगल सेना का घेरा बहुत दिनों तक चलता रहा। लेकिन उनका रणथम्भौर पर अधिकार नहीं हो सका।...[7]
अलाउद्दीन ने राव हम्मीर के पास दुबारा दूत भेजा की हमें विद्रोही सैनिकों को सौंप दो, हमारी सेना वापस दिल्ली लौट जाएगी। हम्मीर हठ पूर्वक अपने वचन पर दृढ था। बहुत दिनों तक मुगल सेना का घेरा चलता रहा और चौहान सेना मुकाबला करती रही।...[8]
अलाउद्दीन को रणथम्भीर पर अधिकार करना मुश्किल लग रहा था। उसने छल-कपट का सहारा लिया। हम्मीर के पास संधि का प्रस्ताव भेजा जिसको पाकर हम्मीर ने अपने आदमी सुल्तान के पास भेजे। उन आदमियों में एक सुर्जन कोठ्यारी (रसद आदि की व्यवस्था करने वाला) व कुछ सेना नायक थे। ..[9]
अलाउद्दीन ने उनको लोभ लालच देकर अपनी तरफ मिलाने का प्रयास किया। इनमें से गुप्त रूप से कुछ लोग सुल्तान की तरफ हो गए।
दुर्ग का घेरा बहुत दिनों से चल रहा था, जिससे दूर्ग में रसद आदि की कमी हो गई। दुर्ग वालों ने अब अन्तिम निर्णायक युद्ध का विचार किया।..[11]
दुर्ग का घेरा बहुत दिनों से चल रहा था, जिससे दूर्ग में रसद आदि की कमी हो गई। दुर्ग वालों ने अब अन्तिम निर्णायक युद्ध का विचार किया।..[11]
राजपूतों ने केशरिया वस्त्र धारण करके शाका किया। राजपूत सेना ने दुर्ग के दरवाजे खोल दिए। भीषण युद्ध करना प्रारम्भ किया। दोनों पक्षों में आमने-सामने का युद्ध था। एक ओर संख्या बल में बहुत कम राजपूत थे तो दूसरी ओर सुल्तान की कई गुणा बडी सेना..[12]
जिनके पास पर्येति युद्धादि सामग्री एवं रसद थी। अंत में राजपूतों की सेना विजयी रही। बादशाह खिलजी को हम्मीर देव चौहान ने हराने के बाद तीन माह तक जेल में बंद रखा । कुछ समय बाद खिलजी ने दोबारा रणथम्भोर पर आक्रमण किया अब की बार खिलजी की सेना बहुत ज्यादा विशाल थी | ...[13]
मुस्लिम सेना ने रणथम्भोर किले का घेरा कडा करते हुए आक्रमण किया था। लेकिन दुर्ग रक्षक उन पर पत्थरों, बाणों की बौछार करते, जिससे उनकी सेना का काफी नुकसान होता था। मुस्लिम सेना का इस तरह घेरा बहुत दिनों तक चलता रहा। लेकिन उनका रणथम्भौर पर अधिकार नहीं हो सका।...[14]
दुर्ग का धेरा बहुत दिनों से चल रहा था, जिससे दूर्ग में रसद आदि की कमी हो गई। दुर्ग वालों ने अब अन्तिम निर्णायक युद्ध का विचार किया। राजपूतों ने केशरिया वस्त्र धारण करके शाका किया। राजपूत सेना ने दुर्ग के दरवाजे खोल दिए। भीषण युद्ध करना प्रारम्भ किया। ..[15]
दोनों पक्षों में आमने-सामने का युद्ध था। एक ओर संख्या बल में बहुत कम राजपूत थे तो दूसरी ओर सुल्तान की कई गुणा बडी सेना, जिनके पास पर्येति युद्धादि सामग्री एवं रसद थी।
राजपूतों के पराक्रम के सामने मुसलमान सैनिक टिक नहीं सके वे भाग छूटे भागते हुए...[16]
राजपूतों के पराक्रम के सामने मुसलमान सैनिक टिक नहीं सके वे भाग छूटे भागते हुए...[16]
मुसलमान सैनिको के झण्डे राजपूतों ने छीन लिए व वापस राजपूत सेना दुर्ग की ओर लौट पड़ी। दुर्ग पर से रानियों ने मुसलमानों के झण्डो को दुर्गे की ओर आते देखकर समझा की राजपूत हार गए अतः उन्होंने जोहर कर अपने आपको अग्नि को समर्पित कर दिया।..[17]
किले में प्रवेश करने पर जौहर की लपटों को देखकर हम्मीर देव चौहान को अपनी भूल का ज्ञान हुआ। उसने प्रायश्चित करने हेतु किले में स्थित शिव मन्दिर पर अपना मस्तक काट कर शंकर भगवान के शिवलिंग पर चढा दिया। अलाउद्दीन को जब इस घटना का पता चला तो उसने लौट कर दुर्ग पर कब्जा कर लिया।...[18]
राव हमीर को वीरता और उनके हठ के लिए याद किया जाता है। उनके हठ के बारे में एक कहावत प्रसिद्ध है–
सिंह गमन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार।
तिरिया तेल, हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार।।
.... कई चीजें सिर्फ एक बार ही होती हैं जैसे सिंह का संतान जनन, सच्चे लोगों की बात...[19]
सिंह गमन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार।
तिरिया तेल, हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार।।
.... कई चीजें सिर्फ एक बार ही होती हैं जैसे सिंह का संतान जनन, सच्चे लोगों की बात...[19]
केले में फल, स्त्री को विवाह के समय तेल/उबटन लगना। इसी प्रकार हम्मीर देव चौहान का हठ है, वे जो ठानते हैं उस पर दुबारा विचार नहीं करते
पोस्ट लेखक: अग्निवंशी ज्योति परमार🙏
✍🏻✍🏻✍🏻@AgnivanshiJyoti
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