Yādukula🪔
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@Game_Changer3

6 تغريدة 17 قراءة Mar 28, 2022
मथुरा ब्रज क्षेत्र की भाषा में "या" को "जा" बोला जाता है जिससे यादव/यादों शब्द जादों में परिवर्तित हो गया और ये जादौन काहे जाते हैं ।
अहीरो ने 1910 के आसपास अभिर महासभा के बाद से यादव लगाना शुरू किया उससे पहले वे खुद को अहीर ही लिखते थे जिसमे ग्वाल, कमरिया, धिंधोर आदि आते थे।
मथुरा से यदुवंश की कई शाखाएं निकली जिसमे भाटीयो ने आगे चलकर भटनेर नामक शहर बसाया फिर वहा से जैसलमेर अपनी राजधानी स्थापित करी।
जादौनो ने बयाना तिमनगढ़ बसाया फिर वहा से करौली नामक शहर बसाया और जडेजा और चूड़ास्मा राजपूतों ने कछ और सौराष्ट्र में अपनी राजधानी स्थापित करी।
सामान्यतः लोग abhir महासभा के बाद से अहीरों ने यादव लगाना शुरू किया और तब से ही अहीरों की पहचान मात्र 100 साल के भीतर यदुवंशियों के तौर पर होने लगी, जबकि अहीरों का यदुवंश से कोई लेना देना नहीं है।
आज भी अहीर पिछड़ी जाति में आते हैं और इनके नेता खुद को शूद्र ही मानते हैं।
राजनीतिक कारणों और आरक्षण की वजह से आज उन की आर्थिक स्थिति सुधर चुकी है तो वे इस बात से नकारते हैं कि वे यदुवंशी नहीं है और खुद को पिछड़ा कहने से बचते हैं और खुद को यदुवंशी इस लिए भी कहते हैं ताकि इनकी पहचान क्षत्रियों में हो सके,जबकि अहीरों को क्षत्रिय कोई नहीं मानता है स्वघोषित
खुद अपने आप को क्षत्रिय साबित करने में लगे रहते हैं, लेकिन आज तक कर नहीं पाए हैं।
असली यदुवंशी (चंद्रवंशी) राजपूत होते हैं जिनमें जादौन, भाटी, जडेजा, चूड़ास्मा और इनसे निकली अन्य शाखाएं है जो अहीरों में गई थी, किसी संबंध के द्वारा, वे आज राजपूतों को उनका भाई ही मानते हैं।

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