सनातन संवाद
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@banna88888

19 تغريدة 5 قراءة Mar 23, 2022
(#Thread)
चार धाम महत्व में पुरी के #जगन्नाथ स्वामी का अलग महत्व है सभी के लिए |
यह क्षत्रिय वंश के लिए एक गौरव की बात हैं कि इस मन्दिर का निर्माण सोलंखी (चालुक्य) राजा इन्द्रप्रधुम्न जी ने करवाया था | ..[1]
चालुक्य इंद्रद्युम्ननैं नास्तिकमतको न्यक्कार करि उत्कलदेससौँ पूं र्वसमुद्र के तट पर श्रीजगदीसको मंदिर बनाय परमपुनीत महाभा गवतधर्म मान्योँ ॥ वाहू देसमैं अपनों राज्य संपन्न हो तासाँ स्वत्व तजि अखिल अ धीस ईश्वर के अंधू अरबिंदनको उभयपनँ आलोचनमैं लयो । ..[2]
ताकै सिंहद्युम्न ९ ४ ताकै महाद्युम्न ९ ५ २१ अद्युम्न मरद्युम्न ३ समर्थयुम्न ४ सूरयुम्न ५ यह पुत्रनको पंचक ५ भयो ॥
श्री जगन्नाथप्रणामः
नीलाचलनिवासाय नित्याय परमात्मने ।
बलभद्रसुभद्राभ्यां जगन्नाथाय ते नमः ।।
जगदानन्दकन्दाय प्रणतार्तहराय च ।
नीलाचलनिवासाय जगन्नाथाय ते नमः ।।..[3]
राजा इंद्रप्रधुमन ने बनवाया था जगन्नाथ मंदिर पुरी :- राजा इंद्र प्रधुमन सोरों व वर्तमान मालवा क्षेत्र के राजा थे जिनके पिता का नाम प्रधुमन और माता सुमति था ।
राजा इंद्रप्रधुमन को सपने में हुए थे जगन्नाथ के दर्शन।..[4]
कई ग्रंथों में राजा इंद्र प्रधुमन और उनके यज्ञ के बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने यहां कई विशाल यज्ञ किए और एक सरोवर बनवाया।
एक रात भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। ..[5]
तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो।
राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा। उसमें से एक था ब्राह्मण विद्यापति।
विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं..[6]
और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्‍ववसु नीलमाधव का उपासक है और उसी ने मूर्ति को गुफा में छुपा रखा है।
चतुर विद्यापति ने मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया। ..[7]
आखिर में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुंचने में सफल हो गया। उसने मूर्ति चुरा ली और राजा को लाकर दे दी।
विश्‍ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ।
अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गए । ..[8]
भगवान गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राज इंद्रप्रधुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते कि वो एक दिन उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे।
राजा ने मंदिर बनवा दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा। ..[9]
भगवान ने कहा कि तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिए समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है।
राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को नहीं उठा पाए। ..[10]
तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्‍ववसु की ही सहायता लेना पड़ेगी। सब उस वक्त हैरान रह गए, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आए।
अब बारी थी लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ने की। ..[11]
राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लकड़ी में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए।
उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं।..[12]
लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई।
लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं।
राजा इंद्रप्रधुयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। [13]
वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी।
अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया.[14]
जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी ‍मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं।
भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। ..[15]
राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।
प्रथम मंदिर की निर्माण चालुक्य वशीय राजा इंद्रप्रधुमनु जी ने महाभारतकालीन समय के अंत में रखी ।..[16]
वर्तमान में जो मंदिर है वह 7वीं सदी में जीर्णोद्धार हुआ है। हालांकि इस मंदिर का जीर्णोद्धार ईसा पूर्व में भी हुआ था। यहां स्थित मंदिर 3 बार टूट चुका है।
1174 ईस्वी में ओडिसा शासक गंगवशीये अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। ..[17]
राजा मानसिंह आमेर ने भी इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। मुख्‍य मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित हैं।
रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे।[18]
।।जय जगन्नाथ स्वामी।।
ॐ शिखिने जगन्नाथाय नम:
अगली पोस्ट में जगन्नाथ मंदिर के चमत्कार...
यह एक शोध का विषय भी हो सकता है भगवान ने सपने में आकर मंदिर बनाने के लिए कहां.. पहला मंदिर भी हो सकता है व शंकराचार्य ने मठों की स्थापना की थी।
🙏

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