Ajeet Bharti
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@ajeetbharti

12 تغريدة 16 قراءة Mar 14, 2023
भक्तजनो! अब हम महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र के ११वें श्लोक में प्रयुक्त यमक अलंकार पर चर्चा करेंगे कि यहाँ आए पाँच सुमन, रजनी और भ्रमर के क्या अर्थ हैं। यहाँ देवी के आंतरिक (गुणों) और बाह्य (रूप) के सौंदर्य की व्याख्या की गई है। श्लोक पढ़िए: #Mahishasurmardini
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अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोरमकान्तियुते
श्रितरजनीरजनीरजनीरजनीरजनीकरवक्त्रभृते ।
सुनयनविभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमराभिदृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।
पहले चार 'सुमनः' का अर्थ क्रमशः सुप्रसन्न, सुंदर मन वाली, पुष्प, फूल सी मृदुल है,
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और इसको बाद 'सुमन' का प्रयोग 'सुमनोरमकान्तियुते' में हुआ है जहाँ 'मन को प्रिय लगने वाली आभा से युक्त' अर्थ आता है।
अगले यमक में पहले 'श्रितरजनी' का अर्थ है रात्रि से सुशोभित, उसके बाद वाली 'रजनी' देवी दुर्गा के कई नामों में से एक है।
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अगली रजनी का अर्थ 'रात जैसी सुख देने वाली', तत्पश्चात् अगली रजनी का अर्थ रात्रि जैसी रहस्यमयी होने से है। इसके बाद 'रजनीकर' का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ चंद्रमा है।
अब भ्रमर की तरफ चलते हैं। पहली बार विभ्रमर का प्रयोग है जिसका अर्थ है 'लालित्य' यानी रमणीयता।
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उसके बाद भँवरे के तीन गुणों के बारे में है कि काले भँवरे, मतवाले भँवरे, चंचल भँवरे। अंतिम बार 'भ्रमराभिदृते' का अर्थ है कि जिस देवी का भ्रमरों द्वारा आदर किया जाता है।
अब 'सुमन' शब्द को देखिए कि जैसे कि फूल के कई गुण होते हैं।
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वो देखने में सुंदर होते हैं, वैसे ही माता दुर्गा में अद्भुत आकर्षण और लावण्य है। वो आपको निकट बुलाती हैं। उसमें सुगंध है तो माता का एक नाम सुगंधा भी होता है। फूल कोमल होते हैं, तो माता एक दर्शनीय रूप कोमलांगी भी है।
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वो फूल सी सुंदर, हृदयाकर्षणकारिणी हैं, और उनका मन भी फूल की तरह मृदुल है। ये सारे रूप उनके पुत्र-पुत्रियों, सारे चराचर जीवों से है जो माता से प्रेम करते हैं, उनकी उपासना करते हैं। इसके साथ ही देवताओं को 'सुमनस्' कहा जाता है, तो माता को 'सुमन' यानी सुंदर मन वाली कहा जाता है।
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'रजनी': देवी के कई नामों में से एक रजनी भी है। यहाँ पर आदि शंकराचार्य ने माँ दुर्गा को रात्रि की विशेषताओं से सुशोभित बताया है कि वो रात्रि की शांति, उसके रहस्य स्वयं पर धारण किए चलती हैं। उसके बाद 'सोम' से बने शब्द सौम्या, जो कि चाँद का पर्याय है, का अर्थ रात्रि होता है।
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कहा जाता है कि रात्रि काल में चंद्रमा से अमृत गिरता है जिससे औषधीय गुण वाले पौधों एवम् अन्य वनस्पतियों में जीवनरस का संचार होता है। माता भी प्राणियों में जीवन का संचार करती हैं, अन्नपूर्णा कहलाती हैं, तो वो अर्थ भी एक है।
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इसके बाद रात्रि में निद्रा भी आती है, माता 'निद्रारूपेणसंस्थिता' भी कही जाती हैं। 'रजनीकरवक्त्रभृते' कहने से अर्थ चंद्रमा के समान कांति धारण करने वाली से है। माँ वैसी ही अमृतवर्षा करने वाली हैं।
'भ्रमर' के माध्यम से कवि ने माता के नयनाभिराम नेत्रों के बारे में लिखा है कि
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देवी के चक्षु काले, चंचल, मतवाले भँवरों की मनमोहकता लिए हुए हैं। जैसे भ्रमरों पर फूलों का पराग या मधु के कारण एक उन्माद रहता है, वैसे ही देवी के अंबकों में भी युद्ध के बाद जीतने का उन्माद दिखता है। साथ ही, भ्रमर मधुपान करता है, देवी दैत्यों के रक्त को पीती है।
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भ्रमर उनका इसी कारण आदर करते हैं क्योंकि देवी के विलोचनों में वही बालसुलभ चंचलता है, मतवालापन है, सलोनापन है।
पीएस: ये सब मैं भी कुछ जगहों से पढ़ कर ही लिख रहा हूँ। भ्रमित न हों कि मुझे आज ज्ञान मिल गया है।
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