Ajeet Bharti
Ajeet Bharti

@ajeetbharti

5 تغريدة 1 قراءة Mar 14, 2023
दुर्गा माँ का जलवा लेकिन अलग लेवल का है। बाकी देवता लोगों को 'वर' देते हैं। इनका है कि आप तीनों को (ब्रह्मा, विष्णु, महादेव) अपनी शक्तियाँ महासरस्वती, महालक्ष्मी, और महाकाली देती हूँ और 'यज्ञों में मेरे नाम के उच्चारण मात्र से सारे देवी-देवता सदैव सुखी हो जाएँगे'।
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दुर्गा स्वयं ही प्रकृति हैं, इसलिए वो त्रिदेव से भी ऊपर हैं और अपनी महाशक्तियों को तीनों देवों को देने के कारण, और उन्हें पोषण की शक्ति दे देने के कारण उन्हें 'त्रिभुवनपोषिणी' भी कहा जाता है कि जो देवता त्रिभुवन चलाते हैं, उनको देवी दुर्गा पुष्ट करती हैं।
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जगन्माता वहीं हैं, जगदम्बिका और सबकी माँ... माता के नाम का यज्ञ में उच्चारण होने के कारण ही देवताओं को उनका यज्ञ-भाग प्राप्त होता है। इसलिए, जब देवता लोग स्वयं ही वरदान आदि दे कर फँसते हैं, तब अंत में माता का आह्वान होता है।
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माता को महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र के दूसरे श्लोक में सुरवरवर्षिणी कहा गया है। वो देवताओं पर वरदानों की वर्षा करती हैं और कहती हैं कि मैं आ गई हूँ, तुम लोग टेंशन मत लो। सब निपटा दूँगी।
यह श्लोक देखिए जहाँ पाँच सुमन, पाँच रजनी और पाँच भ्रमर का अर्थ अलग-अलग होता है।
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यमक अलंकार का सुंदर प्रयोग:
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोरमकान्तियुते
श्रितरजनीरजनीरजनीरजनीरजनीकरवक्त्रभृते ।
सुनयनविभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमराभिदृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।
5/5 (पूरा अर्थ अगले थ्रेड में)

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