आदि शंकराचार्य ने देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् की भी रचना की है। जैसा कि नाम से वर्णित है कि यह अपराध क्षमा के लिए लिखा गया है। इस स्तोत्र में अपनी अज्ञानता, अपूर्णता, पापमय होने की बात स्वीकारते हुए शंकराचार्य लिखते हैं कि हे माता! मैं तुम्हारा मन्त्र, यंत्र, स्तुति, आवाहन,
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ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा आदि कुछ भी नहीं जानता, इसलिए तुम्हारे बारे मे लिखते हुए, तुम्हारी पूजा में, स्तुतिगान में कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करो।
वो माता से कहते हैं:
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवम् ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यम् तथा कुरु ।।
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वो माता से कहते हैं:
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवम् ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यम् तथा कुरु ।।
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तात्पर्य यह है कि हे महादेवि! मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप-नाश करने वाली नहीं है, यह जान कर जैसा उचित समझो वैसा करो।
और यहाँ लोग चार कहानी लिख कर बताते हैं कि उनके जैसा कोई नहीं है।
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और यहाँ लोग चार कहानी लिख कर बताते हैं कि उनके जैसा कोई नहीं है।
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अरे आदि शंकराचार्य लिख रहे हैं कि उनको कुछ नहीं आता, और लिखने में हुई भूल को क्षमा करो माँ। जिनके एक श्लोक का शब्दार्थ समझने में आधा घंटे, हर भावार्थ जानने में घंटे भर और हर शब्द के पीछे की कहानी समझनें में दिन निकल जाए, वो स्वयं को अज्ञानी कहते हैं।
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